शनिवार, 25 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 39

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







समन्तपंचक ताल सभी,

आप्लावित लाल रक्त से।

राम कर रहे श्राद्ध तर्पण,

निज पितरों  का ताल से।।


दादा ऋचीक अरु पितर,

सभी प्रसन्न अब राम से।

आकाशवाणी  हुई तभी,

ऋचीक कहहिं  राम  से।।


बन्द करो अब राम तुम,

श्राद्ध तर्पण आज  से।

जाओ शीघ्र गिरि महेंद्र,

तप करो तुम  आज से।।


आकाशवाणी जब सुनी,

निज दादा  ऋचीक  की।

जा पहुँच  गये   शीघ्र  ही,

देखि रम्य चोटी महेन्द्र की।।


रम्य शिला अब  देखि राम,

थे रम गये  अब शिला राम।

ध्यान  मग्न  हो गये थे राम,

थे बीत  गये  हजारों  साल।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 38

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







अत्याचारी अहंकारी क्षत्रियों का,

बध  कर  रहे  थे राम  बार  बार।

तप हेतु चले जाते गिरि महेंद्र पर,

पर क्षत्रिय अत्याचार हो बार बार।।


राजा जयध्वज के कुछ पौत्र,

बस  गये थे  समन्तपंचक में।

ऋषियों मुनियों  को ढूंढ़ ढूंढ़,

अपमानित कर  रहे पंचक में।।


ध्यानस्थ राम थे गिरि महेन्द्र,

ऋषि पुकार रहे थे राम राम।

उत्पीड़न पर  उत्पीड़न करते,

कहते  कहाँ हैँ अब  तेरे राम।।


कर्ण कुहर में ज्योंही गूँजी,

ऋषियों मुनियों  की पीड़ा।

पवन गति से चल पड़े राम,

जा पहुँचे समन्तपंचक राम।।


चलाया राम ने था परशु ऐसा,

बह चली रुधिर की धार वहाँ।

पाँच सरोवर थे अब तक सूखे,

थी रुधिर  प्रवाह से झीलें वहाँ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

विशेष : समन्तपंचक (कुरुक्षेत्र )


रविवार, 19 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 37

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







याहियावंशी  यदुवंशी के,

सौ थे राजा जयध्वज पूत.

कुछ राम भय  से  थे भागे,

पहुँचे  भोज, अवन्ति  पूत।।


जहाँ जहाँ थे अर्जुन  वंशी,

बढ़ रहे थे उनके अत्याचार।

ढूंढ़ ढूंढ़ ऋषियों मुनियों पर,

कर रहे थे राक्षसी व्यवहार।।


वृह्मर्षि राजर्षि सभी दुखी,

व्यवहार अर्जुन वंशज से।

तभी राम ने लिया संकल्प,

क्यों न मिटा दूँ शीघ्र धरा से।।


अब पवन वेगहिं चले राम,

शोभित जिनके परशु हाथ।

ढूंढ़  ढूंढ़  कर याहिया वंशी, 

सिर कटे पड़े थे धरा अनाथ।।


अर्जुन सहयोगी क्षत्रिय भी,

सिर विहीन थे भू पर आज।

क्षत्रिय अत्याचारी अहंकारी,

सभी भू  पर  पड़े  थे  आज ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


रविवार, 12 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 36

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







करुण क्रन्दन कर रही पद्मिनी,

पौत्र जयध्वज के मर जाने पर।

पूत पोते सभी छोड़ चले आज,

बलात ऋषि कामधेनु लाने पर।।


मातु  जयध्वज  की  मनोरमा,

थी बिलख बिलख कर रो रही।

देव पति की एक  महा भूल से,

आज महिषमती नगरी  रो रही।।


अब  चंद्रवंशी  याहियावंश में,

केवल अवलायें  हि अबलायें।

थीं  लाशों  पर  लाशें पटी हुई,

निज निज पूत खोजें अबलायें।।


महिष्मति  की अब गलियाँ,

शोणित  धारा से  थीं पूरित।

अरु धारा तैरें अब रुण्ड मुंड,

थी कठिन पहचान रुण्ड मुंड।।


ललनाओं को  राम ने छुआ नहीं,

अधिकार कर लिया था राज्य पर।

गर्भ में बालक पल रहे, उन्हें छोड़.

शेष  थे   रुधिर   डूबे  भूमि   पर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


बुधवार, 8 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 35

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







राजा जयध्वज अर्जुन पूत,

सभी भ्रात अरु सेना साथ।

सम्मुख खड़े जमदग्नि पूत,

था परशु अस्त्र उनके हाथ।।


क्यों न जयध्वज वंश मिटाऊँ,

अरु सिगरी सेना आज अभी।

कहकर राम ने परशु चलाया,

काट दिया राजहि शीश तभी।।


दौड़  दौड़  कर जमदग्नि राम,

विद्युदभि परशु  काटहिं शीश।

खीरा सम कटे थे भूमि सैनिक,

ढेर थे लाशों के शीश पर शीश।।


सिगरी   नगरी  में  ढूंढ़  ढूंढ़,

हैहय वंशी क्षत्रिय किये बध।

राज वंश था अब नर विहीन,

किसी अबला को छुआ नहीं।।


दहशत फैल गईं सिगरी नगरी,

अबलायें अब  कर रही रुदन।

छाया  मातम अब राज महल,

रानियाँ  कर  रही सब क्रन्दन।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

सोमवार, 6 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 34

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







राजा ऋषियों का अपमान करे,

यह राजा को  देता शोभा  नहीं।

क्षत्रिय राजा  करे विप्र अपमान,

यह  राजा  को देता  शोभा नहीं।।


पिता  तुम्हारे  गये  पितु आश्रम,

साथ में उनके थी  विशाल सेना.

भव्य स्वागत  किया  पितु मेरे ने,

चकित थे तुम्हारे पिता मय सेना।।


माता पिता  का अपमान देखि,

अरु  राजा ने लूटी थी कामधेनु।

तभी दण्डित किया यहाँ आकर,

वापस  साथ  ले  गया  कामधेनु।।


पिता ब्रह्मर्षि थे तप में लीन,

अर्जुन पूतों ने कर दिया बध।

क्यों न  अर्जुन  वंश  मिटाऊँ ,

कर  दूँ आज  सभी  का  बध।।


था सहस्त्रार्जुन  पूत  जयध्वज,

अब राजा महिष्मति  नगरी का।

पकड़ बाँध लो अब जमद्गनि पूत,

हुआ आदेश  जयध्वज राजा का।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


भार्गव राम खण्डकाव्य - 33

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







निवृत्त अन्तिम संस्कार ,

परशु उठाइ ले चले राम।

पवन गति से  जा पहुँचे,

थे महिष्मती नगरी राम।।


खबर फैल गईं सिगरी नगरी,

हाथ परशु पुनि आ गये राम।

पूत सहस्त्रार्जुन सब दौड़ पड़े,

पकड़ लेउ अब जमदग्नि राम।।


सेना ने भी चहुँ घेरा डाला,

पकड़ो अब जमदग्नि राम।

अन्यायी पथ है कौन आज,

खड़ा पूँछ रहा सम्मुख राम।।


पितु तुम्हारे बलशाली राजा,

बलात ले आये थे कामधेनु।

पिता हमारे  थे  वेदज्ञ ऋषि,

कर  अपमानित  लाये  धेनु।।


मातु पिता अरु गुरु अपमान,

ताहि  दण्ड निज कर्तव्य मान।

अन्यायी  राजा   मिलि पूतों ने,

पितु काट शीश माता अपमान।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 32

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)






 

चिता हुई जब प्रज्वलित,

वेदज्ञ ऋषि जमदग्नि की। 

करबद्ध बैठी  देवि रेणुका,

माँग रही  अन्तिम विदाई।।


धूँ धूँ कर  जल उठी चिता,

देवलोक से होये पुष्प वर्षा।

ऋषि मुनि चहुँ ओर खड़े थे,

कह धन्य देवि करें पुष्प वर्षा।।


त्रिदेव भी  थे आ  गये,

अर्पित करें  पुष्पांजलि।

थे चकित दृश्य देखकर,

सती रेणुका दृश्य  देखि।।


रेणुका जब भस्म हो गईं,

जमदग्नि ऋषि के साथ।

तभी आ  गये  काले मेघ,

झूम बरसे हुई  ठंढी आग।।


राम  ने  मस्तक भस्म लगाई,

मन में  लिया  संकल्प  तभी।

शीघ्र मिटाऊँ सहस्त्रार्जुन वंश,

मन को मिलेगी  शान्ति  तभी।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


सोमवार, 29 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 31

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






चंदन काष्ठ चिता बनी थी,

हुआ था गंगाजल  स्नान।

ले पार्थिव शरीर निज गोद,

बैठी रेणुका प्रभु का ध्यान।।


खबर फैल गईं त्रिभुवन में,

निर्मम हत्या ऋषि जमदग्नि।

सप्तर्षि सभी थे आहत मन,

दौड़े आश्रम ऋषि जमदग्नि।।


भीड़ जुट गईं ऋषियों मुनियों की,

देने विदाई अन्तिम ऋषि जमदग्नि।

अँखियन नीर भरे थे हर किसी के,

जब बैठी रेणुका  चिता  जमदग्नि।।


जब खबर फैल गईं त्रिभुवन में,

हो रही रेणुका सती पति  संग।

ऋषि पत्नियाँ भी आ गईं दौड़,

शची भी पहुँचीं निज पति संग।।


राम ने दी जब चिता मुखाग्नि,

रेणुका भस्म  हुई पति के संग।

सभी ऋषि मुनि अरु सभी देव,

धन्य धन्य रेणुका गईं पति संग।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


रविवार, 28 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 30

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







ध्यानस्थ थे राम महेंद्र गिरि,

जान मातु  पिता   संकट में।

शीघ्र पवन गति से जा पहुँचे ,

अरु  दुर्गति देखि कुटिया में।।


देखि  पिता  की  निर्मम  हत्या,

सुन माता  का  करुण विलाप।

पूँछ रहे राम बार बार जननी से,

किसने की हत्या अरु महा पाप?


आये सहस्त्रार्जुन पूत  सेना सहित,

पितु तुम्हारे थे संध्या वंदन में लीन।

आते ही  उन्होंने  काटा पितु शीश,

 थे नाथ मुख  बोले एक शब्द नहीं।।


पुत्र कामधेनु भी  बलात ले चले,

पर  कामधेनु चली गईं इंद्रलोक।

देखि अर्जुन पूतों  के  अत्याचार,

सहस्त्रार्जुन वंश मिटाऊँ एक बार।।


जमदग्नि निर्मम हत्या सुनि, 

सभी देव हो गये थे हतप्रभ।

यति ऋषि मुनि अरु देवर्षि,

हुये  अचंभित  आज सभी।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

गुरुवार, 25 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 29

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






पिता सहस्त्रार्जुन का बध,

अरु विशाल  सेना संहार।

नीति अनीति  विचार बिनु,

पुत्रों में था प्रतिशोध अपार।।


महिष्मति  जब जासूसों ने,

नहीं राम जमदग्नि आश्रम।

सहस्त्रार्जुन मिलि सभी पूत,

आक्रमण जमदग्नि  आश्रम।।


पूरा आश्रम कर दिया ध्वस्त,

अरु जमदग्नि का सिर काट,

कर दी नृशंस राम पितु हत्या,

बन्द कर दिया रेणुका  कपाट।।


जादुई थी आश्रम में कामधेनु,

कुछ  सैनिक बढ़े उसकी ओर,

चाह रहे ले जाना अपने साथ,

पर चली गई इन्द्रलोक की ओर।।


वापस  हो  गये  महिष्पुर नगरी,

जब अर्जुन पूत निज सेना साथ।

थी देवि रेणुका कर रही विलाप,

अब प्राणनाथ  बिनु हुईं  अनाथ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

भार्गव राम खण्डकाव्य - 28

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







बध  किया कार्तवीर्य अर्जुन  का,

सेना  ने  किया  मुझ  पर  प्रहार।

तभी  निज  दिव्य  परशु प्रहार से,

विशाल  सहस्त्रार्जुन  सेना  संहार।।


मातु पिता गुरु आज्ञाकारी,

अन्यायी  के संहारक  राम।

था जमदग्नि का मन प्रसन्न,

अब जाओ तप  करिये राम।।


पितु परामर्श  सिर माथे,

मातु चरण रज सिर धरि,

अरु पितु का आशिष लेइ,

चले शिवहिं  स्मरण  करि।।


पवन बेग से चल पड़े,

जा पहुँचे  महेंद्र  गिरि।

उच्च शिखर देखि राम,

रम्य  शिला जान  गिरि।।


ध्यानस्थ हुये रम्य शिला पर,

बहु काल  तप में   रहे लीन।

अचानक मन में उथल पुथल,

आश्रम पितु अनुचित हलचल।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


सोमवार, 22 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 27

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943--=)







कार्तवीर्य अर्जुन  का बध कर,

वापस   दिव्य  कामधेनु  राम।

अभी   धेनु  थी  अति  उदास,

अब हर्षित हुइ आई साथ राम।।


कामधेनु आश्रम जब लौटी,

देखि  जमदग्नि  दहाड़ रोई।

दौडि  जमदग्नि मिले थे धेनु,

रेणुका  जा  गले  मिलि  रोई।।


अब रेणुका छोड़ कामधेनु,

वह गले लिपट गईं राम से।

पूत महा  बलशाली अर्जुन,

तुम धेनु छुड़ाकर लाये कैसे?


ऋषि  जमदग्नि अब पूँछ रहे,

दिव्य धेनु वापस आयी कैसे?

था मातु  पिता  दिव्य आशीष,

अरु शिव  की कृपा  महान से।।


अन्यायी राजा का सिर पकड़ा,

परशु से  काटी  भुजायें हजार।

अरु शीश काट सहस्त्रार्जुन का,

फेंक  दी   मुंडी  योजन  हजार।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

शनिवार, 20 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 26

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







कुटिया की दुर्गति देखि,

अरु मातु पिता अपमान।

मातु सम  दिव्य कामधेनु,

बलात लइ राजा बलवान।।


मातु चरण रज धरि सिर,

अरु पितहि लेय आशीष।

मन में  दृढ संकल्प करि ,

काटूं आज अर्जुन शीश।।


पवन  वेग  से चल पड़े,

जा  पहुँचे अर्जुन नगरी।

सारी नगरी हल्ला भयो,

परशु  हाथ  राम   नगरी।।


मातु पिता गुरु आज्ञाकारी,

थे  अन्यायी  संहारक राम।

प्रहरी  हो गये सभी अवाक,

जब अर्जुन पास पहुँचे राम।।


 था पकड़ा शीश एक हाथ से,

परशु से काटी  भुजायें हजार।

चेहरे  का  भाव  परख  राम ने,

काट शीश फेंका योजन हजार।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कनपुर।©


गुरुवार, 18 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 25

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






तप हेतु  राम अभी  तक बाहर,

जब आये  वापस पितु कुटिया।

कुटिया  लगती अब  उजड़ी सी,

थी कामधेनु  अब नाही कुटिया।।


मातु  पास  जब  गये राम,

गले  लिपट कर रोने लगी।

कैसे  हुई   कुटिया  दुर्गति,

अब नाहि दिखती कामधेनु।।


बह रही थी  मातु असुवन धारा ,

मुख  निकलहि  इक  शब्द नहीं।

अब  कीन्ह  इशारा पितु की ओर,

पर मुख निकलहि इक  शब्द नहीं।।


सिर धरि राम  पितु चरणों  में,

तात! हुई  दुर्गति कुटिया कैसे?

थी कुटिया शोभा मेरी कामधेनु,

कहाँ गई  वह  मेरी  सुरभि धेनु?


आया महिष्मति नगरी  राजा,

सहस्त्रार्जुन सेना लेकर साथ।

अपमानित कर दुर्गति कुटिया,

दिव्य  कामधेनु  ले गया साथ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

मंगलवार, 16 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 24

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर, कानपुर।
अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)












कार्तवीर्य था अति  बलशाली,
भगवन दत्तात्रेय के वरदान से।
हो गईं थीं दो से भुजायें हजार,
भगवन दत्तात्रेय के वरदान  से।।

एक  दिवस  आ धमका अर्जुन,
ऋषि जमदग्नि की  कुटिया पर।
था  महिष्मति का अधिपति वह,
साथ उसके सेना थी कुटिया पर।।

जमदग्नि ने जब  जाना,
राजा आये मेरी कुटिया।
अब राजा के स्वागत  में,
खोल दी  अपनी कुटिया।।

थी दिव्य चमत्कारी  कामधेनु,
भव्य स्वागत कीन्ह जमदग्नि।
सेना सहित निज स्वागत देख,
था अचंभित अब सहस्त्रार्जुन।।

बलशाली घमंडी  सहस्त्रार्जुन,
 बल  पूर्वक  ले गया कामधेनु।
अपमानित कर ऋषि जमदग्नि,
बलात ले  गया दिव्य  कामधेनु।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

सोमवार, 15 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 23

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







आये त्रिदेव अनुसुइया परीक्षा,

मातु बना दिये  त्रिदेवहिं शिशु।

सभी शिशु थे भूख से व्याकुल,

मातु करावहि  स्तनपान  शिशु।


बड़ा  हुआ  जब  बालक ,

दत्तात्रेय  अत्रि  बुलावहि,

मातु  जिनकी अनुसुइया,

दत्ता दत्ता  पूत  बुलावहि ।।


थे  तीन शीश  अरु एक शरीर,

भगवन दत्तात्रेय नाम विख्यात।

छह भुजायें थीं शोभित जिनके,

पूत अत्रि  अनुसुइया  विख्यात।।


कार्तवीर्य अर्जुन  था राजा,

पुरा  महिष्मति  नगरी  का।

था दत्तात्रेय का अनन्य भक्त,

क्षत्रिय  था  हैहय  वंश  का।।


देख  कठिन  तपस्या कार्तवीर्य,

हो गये  थे दत्तात्रेय अति प्रसन्न।

मांगो आज तुम मनोवांछित वर,

सुन कार्तवीर्य हुआ अति प्रसन्न।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


मंगलवार, 9 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 22

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)







बार बार कहहिं  ऋषि जमदग्नि,

पूत माँग लो मनोवांछित वरदान।

भ्राता मेरे थे सदा संकट में रक्षक,

आज बिनु भ्राता जग  सूना जान।।


पूत  तुम्हारा अति  सुन्दर वरदान,

तुम्हारा भाव निज भ्राता कल्यान।

तभी  अचानक   दिख  गये भ्राता,

जमदग्नि ने  दिया पहला  वरदान।।


मन में राम अब क्या है इच्छा,

अब शीघ्र मांगो दूजा वरदान।

मातु बिना जग  सूना  लागहि,

अब कौन बुलाये मुझको लाल।।


तभी अचानक रेणुका जागी,

बार बार पुकार रही बेटा राम।

माता अरु सब भईया सम्मुख,

तब भी दिखे अति उदास राम।।


तीजा वरदान अब माँगहि राम,

विस्मृति हो जाये अप्रिय घटना।

था ऋषिवर हाथ सिर बेटा राम,

अब प्रफुल्लित थे जमदग्नि राम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

सोमवार, 8 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 21

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---)







सब विधि मातु अनुकूल जान,

कह  दिया  आदेश  पिता का।

शीश काट  ले जाओ पूत  तुम,

अर्पित   सहर्ष  पति चरणों  में।।


 थी  पितु आज्ञा  सिरोधार्य,

धरि मातु चरण निज शीश।

मन में  शिव  को नमन कर,

काट दिया  प्रिय मातु शीश।।


एक हाथ में  था  परशु,

दूजे मातु रेणुका शीश।

राम पहुँचे पितु के पास,

कीन्ह चरणअर्पित शीश।।


गदगद  हो गये ब्रह्मर्षि अब ,

जान राम  पितु आज्ञाकारी।

पर राम का चेहरा था उदास,

थीं जग  खुशियाँ माता पास।।


जमदग्नि थे अति  हर्षित,

 राम पुत्रों में आज्ञाकारी।

माँगो पूत मनोवांछित वर,

एक नहीं   तीन  तीन वर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 20

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943------)







रहती  संकट  में  मातु साथ,

कहो राम क्या संकट आज।

क्यों नीर भरे नयनों में आज,

उठो पूत  क्या  संकट  आज।।


माँ कहने में  संकोच आज,

पितु आदेश कठिन आज।।

हर संकट में माता रहे साथ,

कहो पूत क्या संकट आज।।


पूत  के कष्ट  निवारण हेतु,

प्राणोंत्सर्ग  भी कम जानो।

क्या पूत  तुम्हारे पथ संकट?

तुरत निवारण उसका जानो।।


मातु आज कठिन परीक्षा भारी,

पितु आदेश कठिन  अरु भारी।

कहो पूत क्या आदेश  पति का,

पूत हमारा प्राणों  से अति भारी।।


प्राणेश्वर का हो आदेश यदि,

काट शीश ले जाओ  अभी।

माता रक्षक सदा हि पूत की,

कहो पूत  पितु आदेश अभी।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 39

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943---) समन्तपंचक ताल सभी, आप्लावित लाल रक्त से। राम कर रहे श्राद्ध तर्पण, निज...