बुधवार, 2 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







इक्कीस  बार  कीन्ही  महि,

क्षत्रिय  विहीन राजाओं  से।

बाँट दी दौलत  उनकी सारी,

महिदेवन्ह को निज हाथों से।।


अन्यायी  क्षत्रिय  राजाओं  का,

था समूल नाश  का भाव अभी।

 पाय शिष्ट व्यवहार दशरथी राम,

दिया सारंग धनु राघव राम तभी।।


तप लीन हो गये  गिरि महेंद्र,

योंही बीत गये  हजारों साल।

धीरे धीरे युग त्रेता  बीत गया,

अब आ गया था द्वापर काल।।


आ गईं दिवस इक माता गंगा,

था साथ में उनके  पुत्र भीष्म।

कर रही प्रार्थना अब  गंगा थी,

भगवन! शिष्य बना लो भीष्म।।


यह बालक यदुवंशी क्षत्रिय,

कैसे बना लूँ  अपना शिष्य?

भविष्य में बनेगा  यह राजा,

अन्याय पथ पर होगा शिष्य।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 55

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







भार्गव  राम ने सब  विधि जाना,

अन्याय  हुआ नहि सीय स्वयंबर।

पवित्र  संकल्प देख  राजा जनक,

जामद्गन्य संतुष्ट हुये सीय स्वयंबर।।


भार्गव राम के कंधे था धनु,

पास बुलाया दशरथी राम।

लो पितु से पाया सारंग धनु,

संधान करो तुम अभी राम।।


चरण रज धरि अरु आशिष पाइ,

दोनों कर लीन्हा धनु सारंग राम।

खींचा चाप ज्योंही ही तीर चढ़ाइ,

थे गद गद हो  गये जमदग्नि राम।।


सारंग धनु दादा ऋचीक विष्णु से,

दादा  ऋचीक दीन्हा पितु मेरे को।

मुझे धनु  मिला पितु जमदग्नि से,

अब राघव राम को पारितोषिक में।।


सारंग धनु सदा रहा न्याय साथ,

ऐसा सोच सौंप दिया राघव राम।

वापस  गिरि  हुये जमदग्नि राम।

तप में लीन  हो  गये भार्गव राम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।©

सोमवार, 24 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 54

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1953----)







था  मातु पिता का  पुण्य  मेरे साथ,

आशीष  जनक  मातु  सुनयना का।

दोनों कर उठाय लीन्हा धनु पिनाक।

पाय आशीष सम्मुख बैठे गुरुवर का।।


राजा  जनक  सदा न्याय धुरी,

मिथिला में होता अन्याय नहीं।

मेरे गुरुवर जँह  होंय उपस्थित,

हो सकता  शिव  अपमान नहीं।।


भगवन! ज्योंही धनु प्रत्यँचा खींची,

पिनाक धनु  हो  गया  था  दो टूक।

तभी  सीय सखियन  मुख से सुना,

हुआ शिव व्रत पूरा जनक लली का।।


भगवन! हम हैँ शिव सूर्य उपासक,

मन  में   कभी  शिव अपमान नहीं।

सब विधि जाना जब जमदाग्नि राम,

मिला शिव अपमान का संकेत नहीं।।


राजा जनक के संकल्प में भी,

शिव अपमान का संकेत नहीं।

जान सुयोग्य वर चयन संकल्प,

जामद्गन्य अब हो गये थे संतुष्ट।।

लेखक  : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 19 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 53

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







आये थे देश देश के राजा बली,

उठा न सके  पिनाक तिल भर।

जनक लली अब हो गईं उदास,

राजा जनक  भी थे अब निराश।।


रुंधे कंठ से अब कह रहे जनक,

क्या धरती आज वीरों से खाली?

सुनि  मिथिलापति  कातर बचन,

सुनयना के भी अश्रु पूरित नयन।।


गुरुवर विश्वामित्र भी थे  बैठे मंच,

कभी देखें विदेह अरु कभी  लली।

कभी  देखें मंच शिव पिनाक भारी,

क्या  स्वयंबर  के राजा  हीन  बली?


आदेश मिला मुझे निज गुरु का,

पिनाक   संधान करो अब राम।

ले चरण रज, आशीषि गुरु पाइ,

यह  सेवक पहुँचा  पास पिनाक।।


मन ही  मन कीन्ही  शिव वंदना,

हो राजा जनक का संकल्प पूरा।

गुरु  विश्वामित्र  का  सम्मान  बढ़े,

हो रानी सुनयना का संकल्प पूरा।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

सोमवार, 17 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 52

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







भंजन पिनाक धनु किसने किया?

किसने किया शिव गुरु अपमान?

राजन आप की मिथिला नगरी में,

कैसे हो गया  गुरु  शिव  अपमान।।


जामद्गन्य अब  पूँछ  रहे थे बार बार,

पर निकला  मुख  से इक  शब्द नहीं।

तभी करबद्ध खड़े हो गये राघव राम,

भगवन अनुमति से बोले सेवक राम।।


भार्गव राम की अनुमति पाइ,

बता दिया संकल्प जनक का।

राजर्षि  विश्वामित्र  हैं मेरे गुरु,

देखन आये स्वयंबर सीता का।।


राजा पधारे थे देश देश से,

बैठे थे बीच स्वयंबर सभा।

तभी मिथिलापति द्वारा हुई,

घोषणा  बीच स्वयंबर सभा।।


पिनाक  रखा था  बीच सभा,

सम्मुख खड़ी थी जनक लली।

दोनों कर  में  लिये  जयमाला,

थी पलक झुकाये जनक लली।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

रविवार, 16 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 51

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)








किया राम ने धनु  संधान,

सीय  स्वयंबर  मिथिला में।

हर्षित हो गई सिगरी नगरी,

ध्वनि गूंज  गई  त्रिभुवन में।।


खुल गई थी  समाधि जामद्गन्य की,

थे समाधि  लगाये  गिरि  महेंद्र पर।

जमदग्नि राम ने अब ध्यान लगाया,

थी शिव पिनाक भंजन कर्ण  कुहर।।


शिव गुरु का अपमान जान,

थे चल पड़े राम परशु लेकर।

पवन मार्ग से तुरत पहुँच गये,

पिनाक भंजन  जनक  नगर।।


रेणुका नंदन  रामहिं    देखि,

भयभीत हो गई सिगरी सभा।

राजा जनक  अरु ऋषि मुनि,

थे कर जोरि खड़े बीच सभा।।


सभी अभिवादन कर रहे,

'राम  राम ' सम्बोधन कर।

भार्गव राम का संकेत पाय,

बैठे   राजा  ऋषि   मुनिवर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


शनिवार, 15 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 50

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---)







जब आयी  वरात जनक नगरी,

विधिवत कीन्ह जनक अगवानी।

कुशध्वज  राजा  जनक   भ्राता,

दशरथ  कंधे   बिठाये  अगवानी।।


आगे आगे चल रहे गुरु वशिष्ठ,

अनुगामी थे उनके  सब  राजा।

हो रहा वरात नर्तन अति सुन्दर,

संगत ताल दे रहे विविध बाजा।।


रानी सुनयना  स्वयं पहुँच गई,

जिस रथ पर  दशरथ  रानियाँ।

दासी साथ,साथ स्वागत माला,

कीन्हे   अर्पित  स्वागत  माला।।


सभी रानियाँ  राजा दशरथ,

आय बैठ गईं स्वयंबर सभा।

वैदिक रीति से सजी वेदियाँ,

पाणि ग्रहण अब  बीच सभा।।


अब हो रही थी विदाई सीता की,

साथ उर्मिला, मांडवी श्रुतिकीर्ति।

अश्रुधारा बहे  सुनयना चंद्रभागा,

जनक कुशध्वज भी न रोक सके।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943-----) इक्कीस  बार  कीन्ही  महि, क्षत्रिय  विहीन राजाओं  से। बाँट दी दौलत ...