लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र (1943-----) |
उधर राम कैलाश शिखर,
इधर रेणुका रुदन दिन रात।
यहाँ हरा भरा है विंध्याचल,
वहाँ सदा होये हिम बरसात।।
पेड़ पौधे भी हैँ वहाँ नहीं,
क्या जल पीकर रहेगा राम।
भूमि जहाँ है समतल नहीं,
क्या अपलक रहेगा राम।।
जब राम गये विश्वामित्र साथ,
तब नाहीं इतनी बिचलित थी।
ऋषि विश्वामित्र पति के मामा,
मन में कोई नहीं आशंका थी।।
सबसे छोटा पंचम लाल,
रेणुका हरदम करती याद।
सम्मुख थाली भोजन की,
तब भी आती राम की याद।।
रात्रि समय जब रेणुका शैय्या,
सदा याद करती पंचम लाल।
नित ही स्वप्न में दिखते राम,
हम अभी भूखे हैँ कहता लाल।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©