बुधवार, 27 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 16

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)









गुप्त गुफा  कैलाश शिखर,

राम  सीख  रहे  दिव्यज्ञान,

अग्नि वायु के थे दिव्यास्त्र,

संचालन  ब्रह्मास्त्र   ज्ञान।।


महा शक्तिशाली विनाशकारी,

पशुपतास्त्र का भी दिया ज्ञान।

मार्शल आर्ट  अरु  युद्ध कला,

पाया  राम  व्यावहारिक ज्ञान।।


युद्ध कला में हो गये निपुण,

यह जान हर्षित शिव मन में।

कुछ  गुप्त मंत्र  दिये राम को,

त्रिलोक विजय कवच साथ में।।


सदा हि राम पथ  धर्मधुरी का 

थे मातु पिता गुरु आज्ञाकारी।

शिव ने सव विधि जान लिया,

अति आल्हादित थे त्रिपुरारी।।


अमोघ अस्त्र विद्युदभि भी,

दे दिया  प्रिय शिष्य राम को.

परशु का आकार  है उसका,

मन भाया जमदग्नि राम को।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


भार्गव राम खण्डकाव्य - 15

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







बहुत काल तक जब राम रहे,

कैलाश शिखर शिव के पास।

इधर रेणुका  की  नींद गायब,

न लागे भूख अरु न ही प्यास।।


राम बिना अब  सदा रेणुका,

रहती थी अब खोई खोई सी।

सपने  में चिल्लाये  राम राम,

आँख खुले दिखते राम नहीं।।


रेणुका के आँखों  में अश्रु देख,

ऋषिवर पूँछहि  क्या कष्ट देवि!

नाथ बहुत  काल भये राम गये,

कैसा होगा राम कैलाश शिखर।।


इक क्षण  के  लिये ध्यान लगाया,

अरु हाल जाना ऋषि जमदग्नि ने।

राम नित सीख रहा दिव्यास्त्र ज्ञान,

कैलाश शिखर की   गुप्त गुफा में।।


नाथ! क्या राम को नींद आती होगी?

क्या नित भरपेट भोजन मिलता होगा?

इन प्रश्नों को सुनकर  ऋषिवर अवाक,

बार बार पूँछ रही थी जमदग्नि अवाक।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©








शुक्रवार, 22 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 14

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)






उधर राम   कैलाश  शिखर,

इधर रेणुका रुदन दिन रात।

यहाँ हरा भरा है  विंध्याचल,

वहाँ सदा  होये हिम बरसात।।


पेड़ पौधे  भी  हैँ वहाँ  नहीं,

क्या जल पीकर रहेगा राम।

भूमि  जहाँ  है समतल नहीं,

क्या   अपलक  रहेगा   राम।।


जब राम गये विश्वामित्र साथ,

तब नाहीं इतनी बिचलित थी।

ऋषि विश्वामित्र पति के मामा,

मन में  कोई नहीं आशंका थी।।


सबसे  छोटा  पंचम लाल,

रेणुका हरदम करती याद।

सम्मुख थाली भोजन  की,

तब भी आती राम की याद।।


रात्रि समय जब रेणुका शैय्या,

सदा  याद करती  पंचम लाल।

नित ही  स्वप्न  में  दिखते  राम,

हम अभी भूखे हैँ कहता लाल।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 13

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







दोनों ही थे शिव तप में लीन,

ऋषि जमदग्नि अरु बेटा राम।

बार बार कह रहे  देवों के देव,

कैसे जमदग्नि अरु  बेटा राम।।


आँख  खुली अब जमदग्नि की,

अरु आँख खुली अब बेटा राम।

दोनों के शीश थे शिव चरणों में,

आशीष चाह रहे जमदग्नि, राम।।


क्या कष्ट आ गया है जमदग्नि,

अरु कैसे आया साथ  में बेटा।

हे देवों के देव! आप अंतर्यामी,

दिव्यास्त्र ज्ञान का इच्छुक बेटा।।


ऋषिवर अब  राम यहीं रुकेगा,

आश्रम कैलाश श्रृंग शिखर पर।

हर्षित हुये अति जमदग्नि   राम,

कर शिवहीं प्रणाम लौटे ऋषिवर।।


ब्रह्म मुहूर्त में जब शिव जागे,

सम्मुख  खड़े राम  धनु कांधे।

क्या नींद नहीं कैलाश शिखर,

पहले शिक्षा तब पलक शिखर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 20 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 12

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







शिव सब  विद्याओं के स्वामी,

था  गुरु  बनाना आसान नहीं।

जमदग्नि मन में एक ही इच्छा,

शिव से मिले  दिव्यास्त्र शिक्षा।।


दुर्गम पथ अरु  दुष्कर  जलवायु,

जमदग्नि भी  गये  राम के साथ।

सौ योजन पर था कैलाश शिखर,

पवन वेग से पहुँचे  राम के साथ।।


त्रिनेत्र बन्द  शिव ध्यान लगाये,

जब पहुँचे  राम कैलाश शिखर।

सम्मुख शोभित  उनका त्रिशूल,

था हिम से श्वेत कैलाश  शिखर।।


पाणि जोरि  कर कीन्ह प्रणाम,

ऋषि  जमदग्नि  अरु बेटा राम।

शिव  सम्मुख  कुछ दूरी  पर ही,

शिव ध्यान में बैठे जमदग्नि राम।।


भूख प्यास अरु शैय्या त्याग,

कीन्ही  तपस्या महादेव की।

कैसे आये   ऋषि  जमदग्नि,

जब खुली आँख महादेव की।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


मंगलवार, 19 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 11

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)






ब्रह्म  मुहूर्त  में  नींद खुली,

वेदज्ञ ऋषि  जमदग्नि की।

सम्मुख खड़े राम कर जोरे,

माँग रहे अनुमति जाने की।।


जाओ बेटा  कैलाश शिखर,

शिव हैँ  युद्ध कला में  प्रवर।

शिव तप करिये उसी शिखर,

शिव अनुकम्पा  तभी  प्रवर।।


शीश चरण धरि आशिष पाइ,

जमदग्नि आशिष हाथ उठाइ।

माता रेणुकहिं  चरण रज धरि,

चले दादा  दादी आशिष  पाइ।।


देवि रेणुका ने जब जाना,

राम गमन कैलाश शिखर,

मन में जागी इक आशंका,

दुर्गम पथ कैलाश शिखर।।


हिमाच्छादित  रहे   कैलाश,

मुश्किल होगा  वहाँ निवास।

अब अश्रु पूरित सदा रेणुका,

कैसे सोना अरु कैसे निवास।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


सोमवार, 18 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य -10

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







जब  शिक्षा जानी पूर्ण हुई,

अनुमति  मांगी  गुरुवर  से।

चरण रज धरि ऋषिवर की।

वापस चले  पवन  वेग   से।।


विंध्याचल के रम्य  शिखर पर,

थी पितु  जमद्गनि  की कुटिया।

राजर्षि विश्वामित्र के आश्रम से,

सौ योजन पर जमदग्नि कुटिया।।


लीन्ह आशीष मातु पिता का,

फिर पहुँचे दादा ऋचीक पास।

युद्ध कला अरु शस्त्र ज्ञान हेतु,

हम जाना चाहें  शिव के पास।।


अनुमति  दादा  दादी  पाइ,

हर्षित  हुये जमदग्नि  राम।

पितु ने  जाना कहा राम से,

शिव तप करिये  बेटा राम।।


शिव थे शिखर हिमालय पर,

हिम आच्छादित सदा शिखर।

था दुर्गम पथ  कैलाश शिखर,

पर राम अडिग हुये  जाने पर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 16

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943----) गुप्त गुफा  कैलाश शिखर, राम  सीख  रहे  दिव्यज्ञान, अग्नि वायु के थे ...