लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---) |
अनीर्णित युद्ध छोड़ देवव्रत से,
भार्गव वापस आये महेंद्र गिरि।
अपनी सिगरी भौतिक दौलत,
बाँट महिदेवन्ह आये महेंद्र गिरि।।
आ गये तभी विप्र द्रोण वहाँ,
पर देने को धन था पास नहीं।
विप्र द्रोण आप जब आये हैँ,
देने को दौलत अब पास नहीं।।
नहिं चाहूँ भौतिक धन भगवन,
हम ज्ञान धन के भूँखे भगवन।
भौतिक धन का हो सदा हरण,
ज्ञान धन का नहिं होय हरण।।
भगवन चाहूँ अस्त्र शस्त्र ज्ञान,
युद्ध कला अरु दिव्य शस्त्र ज्ञान।
हो जाये कृपा यदि विप्रवर की,
चरणों में सीखूँ बैठ भगवन की।।
भगवन भार्गव राम आशिष पाहि,
विप्र द्रोण ठहरे भार्गव आश्रम में,
सभी अस्त्र शस्त्र अरु दिव्य ज्ञान,
शीघ्र पा गये द्रोण गुरुवर भार्गव से।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर©