शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

भार्गव राम

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







वैशाख मास का रम्य महीना,

था सतयुग त्रेता सन्धिकाल।

तिथि तृतीया शुक्ल पक्ष की,

रेणुका जन्मा अद्भुत लाल।।


जमदग्नि कुटिया हो गई जगमग,

जब कुटिया में प्रगटा पंचम लाल.

हर्षित  होकर  गदगद  ऋषि ने,

नाम  रख  दिया  उसका 'राम'।।


जब जाना ऋषियों मुनियों ने,

भीड़ जुटी  ऋषि आश्रम पर।

सब दर्शन  को थे  लालायित,

प्रथम  दर्शन हों शिशु राम के।।


देव  भी गये   वेश  बदलकर,

दर्शन हित जमदग्नि राम के।

मुख तेज देख सभी अचंभित,

जिसने भी दर्शन किये राम के।। 

 

बालक राम का तेज देखि,

जमदग्नि थे अब  चिंतित।

शस्त्र शास्त्र की शिक्षा कैसे,

गुरु  होंय स्वयं  शिव  जैसे।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

रविवार, 22 मार्च 2026

दहशत में मानवता

 लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

 अशर्फी लाल मिश्र (1943-------)


मानवता आज दहशत में,

चहुँ ओर मचा  हाहाकार।

दानवता अब दहाड़ रही,

हुँकार भर रही  बार बार।।


छाये हैँ परमाणु के बादल,

आज दहशत में मानवता।

किस क्षण टकरायें बादल,

अरु हो जाये घनघोर वर्षा।।


विश्व  के कोने  कोने में,

मानव जीवन दहशत में।

कब कैसी आये बौछार,

मानव जीवन दहशत में।।


दानवता है मुँह खोले,

चाह रही  निगलने को,

भूँखे  बच्चे  रहे कराह,

मातायेँ हैँ  सिसक रहीं।।


किस क्षण  होवे  बिस्फोट,

धधक रही परमाणु ज्वाला,

आ  जाओ  तुम घन श्याम,

झूम बरसो हो ठंढी ज्वाला।।

लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 11 मार्च 2026

पतलइयाँ गोरी गोरी

 रचनाकार एवं लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







मधुमास  महीना जब  जब ,

चमकें पतलइयाँ गोरी गोरी।

मन हर किसी का मोह रहीं,

कोमल पतलइयाँ गोरी गोरी।।


लिये खजाना प्राणवायु का,

हैँ कोमल पीपल पतलइयाँ।

निजी कोष हैँ  सदा लुटातीं,

विना भेद कोमल पतलइयाँ।।


देखि देव  वृक्ष  की  शोभा,

हर  किसी   का  मन  मोहे।

सिद्धार्थ  गौतम  भी  न रहे,

मोहे विन कोमल पतलइयाँ।।


जान उदारता देव वृक्ष की,

समाधि लगा ली गौतम ने।

बहु काल ध्यान लगाये रहे,

जग सार  जाना गौतम  ने।।


ज्ञान  मिला जब  गौतम को,

जग में गौतम बुद्ध कहलाये।

सानिध्य पा बुद्ध गौतम का,

पीपल  बोधि  वृक्ष  कहलाये।।

Author: Asharfi Lal Mishra, Akbarpur, Kanpur.©

शनिवार, 7 मार्च 2026

सौंदर्य रजनी का

 लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)


दिवस का अवसान जान,

हुआ निशि पति  आगमन।

प्रफुल्लित थी अब निशा,

देख रजनीपति  आगमन।।


निशा  नील परिधान में,

रुपहले बूटे चमक रहे थे।

 कदम रखा निशापति ने ,

निशा थी  थिरकने लगी।।


सारी रात निशा थिरकी,

शशि केलि करता रहा।।

हथप्रभ सभी उड़गन थे,

छिटक नर्तन देख निशा।।


प्राची दिशि ऊषा आगमन, 

उड़गन करने लगे पलायन।

 देखा चेहरा लाल रवि का,

पीत हुआ चेहरा शशि का।।


जब आँखें तरेरी दिनकर ने,

भयभीत हुई अब रजनी थी।

झटपट नील परिधान समेटा,

भाग  गयी  अब  रजनी थी।।

लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

झलक उपवन की

 लेखक एवं रचनाकार - अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

(अशर्फी लाल मिश्र 1943-----)


दिनकर ने  आँखें खोली,

तब कलियाँ थीं अलसाई।

पात पात पर बिखरे मोती,

रहा  बटोर  दिनकर  मोती।।


अब  खुल  रही थी आँखें,

एक  एक   कलियन की।

मधुकर  कर रहे थे गुंजन ,

मनु   घेरे  थे रसिक  जन।।


कुछ  मकरंद में मदहोश,

कुछ कर  रहे  थे  गुंजन।

कुछ आ   रहे   थे  अभी,

चाहत सुगंध मकरन्द की।।


तितलियाँ थीं मन मोहक,

थीं निज सतरंगी वसन में।

दौड़  दौड़  कर रहीं नर्तन,

मनु  मोह   रहीं  बागन  में।।


इसी बीच आ धमका माली,

लिये डलिया  निज हाथ में।।

जो खिलखिला रहीं कलियाँ,

चुन चुन रख लिये डलिया में।।

लेखक एवं रचनाकार: अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

दशमी का चाँद

 लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943------)






दशमी   का   चाँद    ऐसा,

मनु नवल बधु का मुखड़ा।

कुछ      काल         ठहरो,

मत कहो किसी से दुखड़ा।।


संयम    राखो    मन     में,

उठ जायेगा परदा धीरे धीरे।

शम्मुख  होगी  शरद    पूनो,

होगी    चाल     धीरे     धीरे।।


मुस्कान      होगी     ऐसी।

जनु अमृत वरसे धीरे धीरे।।

— लेखक एवं रचनाकर: अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

प्रातः मेरी खिड़की पर

 लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)






प्रातः मेरी  खिड़की पर,

दस्तक  देती  है  गौरैया।

जब तक बिस्तर न छोड़ूँ,

टिक टिक करती गौरैया।।


निस्वार्थ उसकी सेवा से,

गद गद  रहता  मेरा मन।

कभी नहीं बदले में माँगा,

फिर भी रहता तत्पर मन।।


मनु  है कोई  गृह सेवक, 

कर्तव्य  कर रही गौरैया।

मेरे घर  के आँगन में ही,

दाल भात खाती गौरैया।।


बचपन से यारी मेरी,

आँगन फुदके गौरैया।

फुदक नृत्य करती थी,

मेरा  मन  मोहे गौरैया।।


मनु बचपन की यारी का,

कर्तव्य निभा रही गौरैया।

जब जब खिड़की खोलूँ,

 तुरत  उड़  जाये  गौरैया।।

रचनाकार एवं लेखक: अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।© अशर्फी लाल मिश्र (1943----) वैशाख मास का रम्य महीना, था सतयुग त्रेता सन्धिकाल। तिथि तृतीया शुक्ल...