शनिवार, 15 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 50

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---)







जब आयी  वरात जनक नगरी,

विधिवत कीन्ह जनक अगवानी।

कुशध्वज  राजा  जनक   भ्राता,

दशरथ  कंधे   बिठाये  अगवानी।।


आगे आगे चल रहे गुरु वशिष्ठ,

अनुगामी थे उनके  सब  राजा।

हो रहा वरात नर्तन अति सुन्दर,

संगत ताल दे रहे विविध बाजा।।


रानी सुनयना स्वयं पहुँच गई,

जिस रथ पर दशरथ  रानियाँ।

दासी साथ,साथ स्वागत माला,

कीन्हे   अर्पित  स्वागत  माला।।


सभी रानियाँ  राजा दशरथ,

आकर  बैठे   स्वयंबर  सभा।

वैदिक रीति से सजी वेदियाँ,

पाणि ग्रहण अब  बीच सभा।।


अब हो रही थी विदाई सीता की,

साथ उर्मिला, मांडवी श्रुतिकीर्ति।

अश्रुधारा बहे  सुनयना चंद्रभागा,

जनक कुशध्वज भी न रोक सके।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 49

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







बत्तीस योजन दूरी थी,

साकेत  से  जनकपुरी।

चार  दिवस वरयात्रा में,

वरात पहुँची जनकपुरी।।


ढोल नगाड़ों  की ध्वनि गूँजी,

खुशी फैल गई सिगरी नगरी।

हर कोई था अति आल्हादित,

आ  गई वरात मिथिला नगरी।।


जगह जगह  थे  तोरण द्वार,

अरु सजे थे भव्य बन्दनवार।

मिथिलापति  भी  जा पहुँचे,

मिथिला नगरी   मुख्य  द्वार।।


आगे आगे था बज रहा बैंड,

घुड़सवार गज  थे अनुगामी।

सिर  सोहे  केसरिया  पगड़ी,

 हाथ जिनके साकेत निसान।।


अनुगामी रथ पर राजा दशरथ,

 कुल गुरु वशिष्ठ थे  बैठे  साथ।

विदेह  हाथ में थी स्वागत माला,

प्रथम कीन्ही अर्पित  गुरु  माला।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


बुधवार, 12 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 48

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






गुरु वशिष्ठ की अनुमति से,

अरु मंत्री सुमंत की राय से।

सज गये थे रथ हाथी घोड़ा,

सज  गई  तभी पैदल  सेना।।


थे बज रहे अब ढोल नगाड़े,

आगे आगे  थे  अश्व सैनिक।

सिर  सोहे  केसरिया  पगड़ी,

थे हाथ लिये साकेत निशान।।


था पीछे दिव्य रथ वशिष्ठ का,

साथ में बैठे थे दशरथ राजा।

वशिष्ठ सिर था भव्य जटा जूट,

मुतियन  जड़ित   मुकुट राजा।।


अनुगामी रथ में शोभित,

राजा अरु थे राजकुमार।

विराजमान  थे  मध्य रथ,

भरत अरु शत्रुघ्न कुमार।।


पीछे  पीछे   जन  साकेतपुरी,

थे   दायें   बायें  गज  असवार।

बज  रहे नगाड़े  ढोल पखावज,

तुरही झांझ शंख सिलसिलेवार।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 47

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







मुनि सतानंद की अनुमति पाय,

धीरे धीरे चल पड़ी जनक लली।

अनुगामी हो गईं थीं संग सहेली,

पिय छवि अँखियन जनक लली।।


अब पहुँच गईं थी जनक सुता,

जँह मंच खड़े राघव राम  बली।

मन में कर  रही  सबहिं  प्रणाम,

आशिष माँग  रही  जनक लली।।


पलक उठाय भरि नैननि छवि,

गले जयमाल डाली  राम बली।

करतल ध्वनि अब  गूँजी सभा,

तभी गगन पुष्प वर्षा होने लगी।।


महर्षि विश्वामित्र की अनुमति से,

मिथिला राजन भेजा साकेत दूत।

खुशी फैल गईं  सिगरी अयोध्या,

जब वरात आमंत्रण लाया  दूत।।


राजा दशरथ थे अति प्रफुल्लित,

अनुमति माँग  रहे  कुल गुरु से।

राजा मिथिला  ने लिखा पत्र में,

राजन वरात लइयो  दल बल से।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शनिवार, 8 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 46

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र 







शर  चाप  चढ़ाया  जब ही राम 

करतल  ध्वनि  से  गूँजी  सभा।

राम  खैचत चाप  दो  टूक भयो,

थी थिरक पड़ी सिगरी  सखियाँ।।


थी रानी  सुनयना भी थिरक  पड़ी,

अब बिन थिरके राजा जनक नहीं।

थी  छोटी  बहन अब सीय उर्मिला,

फुदक फुदक  कर नृत्य करने लगी।।


दोनों कर में था अब शोभित, 

भव्य जयमाल  जनक लली।

दायें बायें  मांडवी श्रुतकीर्ति,

दोनों  राजा  कुशध्वज लली।।


कुशध्वज राजा जनक भ्राता,

कर उठाय अब थिरकन  लगे।

आये  थे  राजा  स्वयंबर बली,

सब करतल  ध्वनि  करने लगे।।


सीय अधरन बिच दंत दिखें,

मनु पंगति खिली कुंद कली।

कपोल भी अब कुछ कह रहे,

मनोदशा  अब  जनक  लली।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 45

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







गुरु कृपा से अब राघव राम,

उठा लिया धनु दोनों कर से।

 खुशी फैल गईं सिगरी सभा,

करतल ध्वनि हो  रही सभा।।


जनक  लली  इक  टक  देखै,

जब धनुष उठा  दोनों कर से।

थीं सखियाँ पास जनक लली,

करें  ठिठोली  जनक लली से ।।


एक सखी  कह रही सखी से,

जनक  लली  कर्पूर  सी  गौर।

राम दिख रहे कुछ काले काले,

दूजी सखी राम  केश  घुँघराले।।


सखियन बीच कह रही सखी,

चाँद सा मुखड़ा जनक लली।

जनक लली भी अब देख रही,

तिरछे नयनन  अब  राम बली।


अब प्रण पूरा होये पितु का,

शिव  आराधै  जनक  लली।

अब राम  पिनाक संधान करें,

अधीर हो रही थी जनक लली।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

रविवार, 2 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 44

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







ऋषि विश्वामित्र भी देख रहे,

थे भव्य  स्वयंबर  चारों ओर।

कभी पिनाक अरु कभी लली,

कभी  उदास जनक  की ओर।।


अब खड़े हो गये थे विश्वामित्र,

राजन! आये बालक मेरे साथ।

दोनों बालक राजा दशरथ पूत,

बड़ा राम है  छोटा लक्ष्मण पूत।।


गुरु संकेत पाइ अब राम उठे,

चरण  रज धरि  पाइ आशीष।

धीरे  धीरे  चल  पड़े  उस ओर,

जहाँ शोभित था शिव पिनाक।।


राम खड़े जहाँ रखा पिनाक,

करबद्ध  खड़े  मांगे  आशीष.

कुछ  बैठे राजा उपहास  करें,

बालक क्या जाने धनु संधान?


अब नेत्र बन्द कर लिये राम ने,

 मन में कीन्ह  शिवहिं  प्रणाम।

 सम्मुख बैठे थे गुरु विश्वामित्र,

बार बार कर रहे गुरुहिं प्रणाम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 50

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---) जब आयी  वरात जनक नगरी, विधिवत कीन्ह जनक अगवानी। कुशध्वज  राजा  जनक  ...