बुधवार, 20 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 12

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







शिव सब  विद्याओं के स्वामी,

था  गुरु  बनाना आसान नहीं।

जमदग्नि मन में एक ही इच्छा,

शिव से मिले  दिव्यास्त्र शिक्षा।।


दुर्गम पथ अरु  दुष्कर  जलवायु,

जमदग्नि भी  गये  राम के साथ।

सौ योजन पर था कैलाश शिखर,

पवन वेग से पहुँचे  राम के साथ।।


त्रिनेत्र बन्द  शिव ध्यान लगाये,

जब पहुँचे  राम कैलाश शिखर।

सम्मुख शोभित  उनका त्रिशूल,

था हिम से श्वेत कैलाश  शिखर।।


पाणि जोरि  कर कीन्ह प्रणाम,

ऋषि  जमदग्नि  अरु बेटा राम।

शिव  सम्मुख  कुछ दूरी  पर ही,

शिव ध्यान में बैठे जमदग्नि राम।।


भूख प्यास अरु शैय्या त्याग,

कीन्ही  तपस्या महादेव की।

कैसे आये   ऋषि  जमदग्नि,

जब खुली आँख महादेव की।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


मंगलवार, 19 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 11

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)






ब्रह्म  मुहूर्त  में  नींद खुली,

वेदज्ञ ऋषि  जमदग्नि की।

सम्मुख खड़े राम कर जोरे,

माँग रहे अनुमति जाने की।।


जाओ बेटा  कैलाश शिखर,

शिव हैँ  युद्ध कला में  प्रवर।

शिव तप करिये उसी शिखर,

शिव अनुकम्पा  तभी  प्रवर।।


शीश चरण धरि आशिष पाइ,

जमदग्नि आशिष हाथ उठाइ।

माता रेणुकहिं  चरण रज धरि,

चले दादा  दादी आशिष  पाइ।।


देवि रेणुका ने जब जाना,

राम गमन कैलाश शिखर,

मन में जागी इक आशंका,

दुर्गम पथ कैलाश शिखर।।


हिमाच्छादित  रहे   कैलाश,

मुश्किल होगा  वहाँ निवास।

अब अश्रु पूरित सदा रेणुका,

कैसे सोना अरु कैसे निवास।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


सोमवार, 18 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य -10

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







जब  शिक्षा जानी पूर्ण हुई,

अनुमति  मांगी  गुरुवर  से।

चरण रज धरि ऋषिवर की।

वापस चले  पवन  वेग   से।।


विंध्याचल के रम्य  शिखर पर,

थी पितु  जमद्गनि  की कुटिया।

राजर्षि विश्वामित्र के आश्रम से,

सौ योजन पर जमदग्नि कुटिया।।


लीन्ह आशीष मातु पिता का,

फिर पहुँचे दादा ऋचीक पास।

युद्ध कला अरु शस्त्र ज्ञान हेतु,

हम जाना चाहें  शिव के पास।।


अनुमति  दादा  दादी  पाइ,

हर्षित  हुये जमदग्नि  राम।

पितु ने  जाना कहा राम से,

शिव तप करिये  बेटा राम।।


शिव थे शिखर हिमालय पर,

हिम आच्छादित सदा शिखर।

था दुर्गम पथ  कैलाश शिखर,

पर राम अडिग हुये  जाने पर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शनिवार, 16 मई 2026

भार्गव राम (खण्डकाव्य) - 9

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---=-)











ब्रह्म मुहूर्त में ऋषिवर जागें,
कंधे धनु सम्मुख राम दिखें।
दौड़ि राम चरण सिर नावहिं ,
नित ही गुरु आशिष पावहिं।।

राजर्षि  देहिं दिव्यास्त्र ज्ञान,
ताहि सीखें राम चित्त लगाइ।
बालक राम ने अल्प समय में,
सीख लिये सब चित्त लगाइ।।

राजर्षि कहें अब  राम  से,
अभी शेष  है  युद्ध कला।
आह्वान ही दिव्यास्त्रों का,
अरु प्रयोग है  युद्ध कला।।

युद्ध कला में हो  प्रतिद्वंदी,
तभी होये ज्ञान युद्ध कला।
गुरुवर राम आज प्रतिद्वंदी,
दीजे ज्ञान अब युद्ध कला।।

असहज हो गये राजर्षि,
सारंग धनु की टंकार से।
ऋषिवर ने हाथ उठाकर,
पूर्ण शिक्षा राम आज से।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

गुरुवार, 14 मई 2026

भार्गव राम (खण्डकाव्य) - 8

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)










थे गये  राम राजर्षि  साथ,
मन में  पाले  एक  ललक।
जल्दी मिले दिव्यास्त्र ज्ञान,
गायब  नींद  सदा अपलक।।

व्रह्म  मुहूर्त  की थी  बेला,
खुली आँख राजर्षि तभी।
सम्मुख   देखा  खड़े  राम,
सारंग धनु अरु तीर साथ।।

क्या नींद नहीं आई राम,
इस नये  नये आश्रम में।
क्या किसी ने है विघ्न डाला,
सबक सिखाऊँ शीघ्र अभी।।

पितामह! मन में मेरे ललक,
 दिव्यास्त्र ज्ञान तभी पलक।
दीजे मुझको दिव्यास्त्र ज्ञान,
तभी नींद अरु झपकें पलक।।

देखि  ललक  पौत्र  राम की,
हर्षित राजर्षि  अति  मन में।
ऊषा की पहली किरण जान,
प्रारम्भ हुआ  दिव्यास्त्र ज्ञान।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


सोमवार, 11 मई 2026

भार्गव राम (खण्डकाव्य) -7

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर, कानपुर।©


अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






खेल खेल में राम सीखे,

धनु संधान जमदग्नि से।

खुशी खुशी में धनु पाया,

अपने पितु जमदग्नि से।।


धनु का नाम था सारंग,

ऋचीक से जमदग्नि को।

वही धनुष खुशी खुशी में,

जमदग्नि  दीन्हा राम को।।


बचपन से  धनुहाँ प्यारा,

धनु सारंग रहता साथ में।

जहाँ  कहीं भी जाते राम, 

धनु सारंग रहता साथ में।।


राम  गये राजर्षि संग,

सारंग  कंधे राम संग।

पवन वेग से थे महर्षि,

उसी चाल थे राम संग।।


महर्षि  थे चकित मुदित,

बालक राम की चाल से।

मन में  थे आल्हादित थे,

अरु चेहरे की मुस्कान से।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शुक्रवार, 8 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 6

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-------)






आशीष मातु प्रात काल,

अरु पितु  अनुमति पाइ।

दादी चरण रज सिर धरि,

अरु दादहिं शीश झुकाइ।।


चल पड़े  राम हर्षित हुइ,

राजर्षि  विश्वामित्र साथ।

आगे आगे चलें  ऋषिवर,

अनुगामी राम साथ साथ।।


महर्षि आश्रम था बिसौल

 जिला मधुबनी बिहार में।

दूर की यात्रा  जान ऋषि,

चल रहे पवन की चाल में।।


 आश्रम निकट जनकपुर,

मिथिला  के साम्राज्य से।

सौ योजन की दूरी पर था,

जमदग्नि  के आवास  से।।


बीच बीच में मुड़कर देखें,

ऋषिवर जमद्गनि राम को।

कुछ पल में  निज आश्रम,

लिये भगिनी पौत्र राम को।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।©


भार्गव राम खण्डकाव्य - 12

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943----) शिव सब  विद्याओं के स्वामी, था  गुरु  बनाना आसान नहीं। जमदग्नि मन मे...