मंगलवार, 8 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 59

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







देवव्रत  थे  बचन  बद्ध,

खुशी  पितु शांतनु हित।

न  करूंगा कभी विवाह,

अरु न धरूंगा सिर छत्र।।


मिला गुरु परशुराम सन्देश,

हो गये थे बेचैन अब देवव्रत।

थे भार्गव राम भी पहुंचे गये,

वायु मार्ग से पावन कुरुक्षेत्र।।


बचन बद्धता  के  कारण,

असंभव अंबा अपनाना। 

जग कलंक के भय से ही,

गुरु युद्ध  ही उचित माना।।


अब रथ  बैठ गये थे देवव्रत,

चल पड़ी  साथ उनकी सेना।

पहुँचे  पावन  भूमि  कुरुक्षेत्र,

सम्मुख देखा गुरु परशु  हाथ।।


रथ से उतर गये गंगा पुत्र,

चरण रज धरि गुरुवर की।

लीन्ह आशीष युद्ध भूमि में,

मन मुदित राम युद्ध भूमि में।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


भार्गव राम खण्डकाव्य - 58

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







था  रचा  स्वयंबर  काशी  में,

काशी  नरेश  की पुत्रियों का।

अपहरण कर लाये थे देवव्रत,

अंबा अंबिका अंबालिका का।।


अंबा ने हस्तिनापुर में बताया,

हमरे दिल में बैठे शाल्व नरेश।

जब जानी देवव्रत अंबा व्यथा,

ले गये अंबा पास शाल्व नरेश।।


अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,

अब थी निराश काशी नरेश बाला।

अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,

नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।


माँग रही न्याय भीख अंबा,

सारे जगत में भटकी  अंबा।

हर जगह ठुकराई  गईं अंबा,

आश्रम भार्गव अंत में अंबा।।


जब व्यथा सुनी अंबा की,

भेजा देवव्रत तुरत सन्देश।

अपनाओ अपहरित बाला,

या फिर करिये मुझसे युद्ध।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 57

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







गंगे! सब  अन्यायी क्षत्रिय राजा,

करें उत्पीड़न ऋषियों मुनियों का।

क्षत्रिय कैसे बना लूँ अपना शिष्य?

अरु कैसे दूँ  ज्ञान अस्त्र शस्त्र का?


भगवन! आप का  कथन सत्य,

क्षत्रिय राजा पथ अन्याय सदा।

पर हित उनमें नहिं  होता  भाव,

निज स्वारथ में  रहते  डूबे सदा।।


ऋषिवर!पूत हमारा अनुशासित,

सदा मातु पिता गुरु आज्ञाकारी।

गंगा  विनय  कर  रही  बार बार,

पूतहि  शिष्य बना  लो एक बार।।


गंगा पुत्र  चरण रज धरि,

अनुमति माँग रहे राम से।

अनुमति पाइ कहें देवव्रत,

नहिं छत्र, शपथ आज से।।


सब विधि आश्वासन पाइ,

स्वीकृति दी भार्गव राम ने।

शस्त्र ज्ञान अरु युद्ध कला,

दिया दिव्य ज्ञान भी राम ने।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 2 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







इक्कीस  बार  कीन्ही  महि,

क्षत्रिय  विहीन राजाओं  से।

बाँट दी दौलत  उनकी सारी,

महिदेवन्ह को निज हाथों से।।


अन्यायी  क्षत्रिय  राजाओं  का,

था समूल नाश  का भाव अभी।

 पाय शिष्ट व्यवहार दशरथी राम,

दिया सारंग धनु राघव राम तभी।।


तप लीन हो गये  गिरि महेंद्र,

योंही बीत गये  हजारों साल।

धीरे धीरे युग त्रेता  बीत गया,

अब आ गया था द्वापर काल।।


आ गईं दिवस इक देवि  गंगा,

था साथ में उनका पुत्र देवव्रत।

कर रही प्रार्थना अब  गंगा थी,

भगवन! शिष्य बना लो देवव्रत।।


यह बालक यदुवंशी क्षत्रिय,

कैसे बना लूँ  अपना शिष्य?

भविष्य में बनेगा  यह राजा,

अन्यायी पथ पर होगा शिष्य।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 55

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







भार्गव  राम ने सब  विधि जाना,

अन्याय  हुआ नहि सीय स्वयंबर।

पवित्र  संकल्प देख  राजा जनक,

जामद्गन्य संतुष्ट हुये सीय स्वयंबर।।


भार्गव राम के कंधे था धनु,

पास बुलाया दशरथी राम।

लो पितु से पाया सारंग धनु,

संधान करो तुम अभी राम।।


चरण रज धरि अरु आशिष पाइ,

दोनों कर लीन्हा धनु सारंग राम।

खींचा चाप ज्योंही ही तीर चढ़ाइ,

थे गद गद हो  गये जमदग्नि राम।।


सारंग धनु दादा ऋचीक विष्णु से,

दादा  ऋचीक दीन्हा पितु मेरे को।

मुझे धनु  मिला पितु जमदग्नि से,

अब राघव राम को पारितोषिक में।।


सारंग धनु सदा रहा न्याय साथ,

ऐसा सोच सौंप दिया राघव राम।

वापस  गिरि  हुये जमदग्नि राम।

तप में लीन  हो  गये भार्गव राम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।©

सोमवार, 24 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 54

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1953----)







था  मातु पिता का  पुण्य  मेरे साथ,

आशीष  जनक  मातु  सुनयना का।

दोनों कर उठाय लीन्हा धनु पिनाक।

पाय आशीष सम्मुख बैठे गुरुवर का।।


राजा  जनक  सदा न्याय धुरी,

मिथिला में होता अन्याय नहीं।

मेरे गुरुवर जँह  होंय उपस्थित,

हो सकता  शिव  अपमान नहीं।।


भगवन! ज्योंही धनु प्रत्यँचा खींची,

पिनाक धनु  हो  गया  था  दो टूक।

तभी  सीय सखियन  मुख से सुना,

हुआ शिव व्रत पूरा जनक लली का।।


भगवन! हम हैँ शिव सूर्य उपासक,

मन  में   कभी  शिव अपमान नहीं।

सब विधि जाना जब जमदाग्नि राम,

मिला शिव अपमान का संकेत नहीं।।


राजा जनक के संकल्प में भी,

शिव अपमान का संकेत नहीं।

जान सुयोग्य वर चयन संकल्प,

जामद्गन्य अब हो गये थे संतुष्ट।।

लेखक  : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 19 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 53

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







आये थे देश देश के राजा बली,

उठा न सके  पिनाक तिल भर।

जनक लली अब हो गईं उदास,

राजा जनक  भी थे अब निराश।।


रुंधे कंठ से अब कह रहे जनक,

क्या धरती आज वीरों से खाली?

सुनि  मिथिलापति  कातर बचन,

सुनयना के भी अश्रु पूरित नयन।।


गुरुवर विश्वामित्र भी थे  बैठे मंच,

कभी देखें विदेह अरु कभी  लली।

कभी  देखें मंच शिव पिनाक भारी,

क्या  स्वयंबर  के राजा  हीन  बली?


आदेश मिला मुझे निज गुरु का,

पिनाक   संधान करो अब राम।

ले चरण रज, आशीषि गुरु पाइ,

यह  सेवक पहुँचा  पास पिनाक।।


मन ही  मन कीन्ही  शिव वंदना,

हो राजा जनक का संकल्प पूरा।

गुरु  विश्वामित्र  का  सम्मान  बढ़े,

हो रानी सुनयना का संकल्प पूरा।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

भार्गव राम खण्डकाव्य - 59

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943----) देवव्रत  थे  बचन  बद्ध, खुशी  पितु शांतनु हित। न  करूंगा कभी विवाह, ...