शनिवार, 20 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 26

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







कुटिया की दुर्गति देखि,

अरु मातु पिता अपमान।

मातु सम  दिव्य कामधेनु,

बलात लइ राजा बलवान।।


मातु चरण रज धरि सिर,

अरु पितहि लेय आशीष।

मन में  दृढ संकल्प करि ,

काटूं आज अर्जुन शीश।।


पवन  वेग  से चल पड़े,

जा  पहुँचे अर्जुन नगरी।

सारी नगरी हल्ला भयो,

परशु  हाथ  राम   नगरी।।


मातु पिता गुरु आज्ञाकारी,

थे  अन्यायी  संहारक राम।

प्रहरी  हो गये सभी अवाक,

जब अर्जुन पास पहुँचे राम।।


 था पकड़ा शीश एक हाथ से,

परशु से काटी भुजायें हजार।

चेहरे  का भाव  परख राम ने,

काट शीश योजन फेंका हजार।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कनपुर।©


गुरुवार, 18 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 25

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






तप हेतु  राम अभी  तक बाहर,

जब आये  वापस पितु कुटिया।

कुटिया  लगती अब  उजड़ी सी,

थी कामधेनु  अब नाही कुटिया।।


मातु  पास  जब  गये राम,

गले  लिपट कर रोने लगी।

कैसे  हुई   कुटिया  दुर्गति,

अब नाहि दिखती कामधेनु।।


बह रही थी  मातु असुवन धारा ,

मुख  निकलहि  इक  शब्द नहीं।

अब  कीन्ह  इशारा पितु की ओर,

पर मुख निकलहि इक  शब्द नहीं।।


सिर धरि राम  पितु चरणों  में,

तात! हुई  दुर्गति कुटिया कैसे?

थी कुटिया शोभा मेरी कामधेनु,

कहाँ गई  वह  मेरी  सुरभि धेनु?


आया महिष्मति नगरी  राजा,

सहस्त्रार्जुन सेना लेकर साथ।

अपमानित कर दुर्गति कुटिया,

दिव्य  कामधेनु  ले गया साथ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

मंगलवार, 16 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 24

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर, कानपुर।
अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)












कार्तवीर्य था अति  बलशाली,
भगवन दत्तात्रेय के वरदान से।
हो गईं थीं दो से भुजायें हजार,
भगवन दत्तात्रेय के वरदान  से।।

एक  दिवस  आ धमका अर्जुन,
ऋषि जमदग्नि की  कुटिया पर।
था  महिष्मति का अधिपति वह,
साथ उसके सेना थी कुटिया पर।।

जमदग्नि ने जब  जाना,
राजा आये मेरी कुटिया।
अब राजा के स्वागत  में,
खोल दी  अपनी कुटिया।।

थी दिव्य चमत्कारी  कामधेनु,
भव्य स्वागत कीन्ह जमदग्नि।
सेना सहित निज स्वागत देख,
था अचंभित अब सहस्त्रार्जुन।।

बलशाली घमंडी  सहस्त्रार्जुन,
 बल  पूर्वक  ले गया कामधेनु।
अपमानित कर ऋषि जमदग्नि,
बलात ले  गया दिव्य  कामधेनु।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

सोमवार, 15 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 23

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







आये त्रिदेव अनुसुइया परीक्षा,

मातु बना दिये  त्रिदेवहिं शिशु।

सभी शिशु थे भूख से व्याकुल,

मातु करावहि  स्तनपान  शिशु।


बड़ा  हुआ  जब  बालक ,

दत्तात्रेय  अत्रि  बुलावहि,

मातु  जिनकी अनुसुइया,

दत्ता दत्ता  पूत  बुलावहि ।।


थे  तीन शीश  अरु एक शरीर,

भगवन दत्तात्रेय नाम विख्यात।

छह भुजायें थीं शोभित जिनके,

पूत अत्रि  अनुसुइया  विख्यात।।


कार्तवीर्य अर्जुन  था राजा,

पुरा  महिष्मति  नगरी  का।

था दत्तात्रेय का अनन्य भक्त,

क्षत्रिय  था  हैहय  वंश  का।।


देख  कठिन  तपस्या कार्तवीर्य,

हो गये  थे दत्तात्रेय अति प्रसन्न।

मांगो आज तुम मनोवांछित वर,

सुन कार्तवीर्य हुआ अति प्रसन्न।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


मंगलवार, 9 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 22

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)







बार बार कहहिं  ऋषि जमदग्नि,

पूत माँग लो मनोवांछित वरदान।

भ्राता मेरे थे सदा संकट में रक्षक,

आज बिनु भ्राता जग  सूना जान।।


पूत  तुम्हारा अति  सुन्दर वरदान,

तुम्हारा भाव निज भ्राता कल्यान।

तभी  अचानक   दिख  गये भ्राता,

जमदग्नि ने  दिया पहला  वरदान।।


मन में राम अब क्या है इच्छा,

अब शीघ्र मांगो दूजा वरदान।

मातु बिना जग  सूना  लागहि,

अब कौन बुलाये मुझको लाल।।


तभी अचानक रेणुका जागी,

बार बार पुकार रही बेटा राम।

माता अरु सब भईया सम्मुख,

तब भी दिखे अति उदास राम।।


तीजा वरदान अब माँगहि राम,

विस्मृति हो जाये अप्रिय घटना।

था ऋषिवर हाथ सिर बेटा राम,

अब प्रफुल्लित थे जमदग्नि राम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

सोमवार, 8 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 21

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---)







सब विधि मातु अनुकूल जान,

कह  दिया  आदेश  पिता का।

शीश काट  ले जाओ पूत  तुम,

अर्पित   सहर्ष  पति चरणों  में।।


 थी  पितु आज्ञा  सिरोधार्य,

धरि मातु चरण निज शीश।

मन में  शिव  को नमन कर,

काट दिया  प्रिय मातु शीश।।


एक हाथ में  था  परशु,

दूजे मातु रेणुका शीश।

राम पहुँचे पितु के पास,

कीन्ह चरणअर्पित शीश।।


गदगद  हो गये ब्रह्मर्षि अब ,

जान राम  पितु आज्ञाकारी।

पर राम का चेहरा था उदास,

थीं जग  खुशियाँ माता पास।।


जमदग्नि थे अति  हर्षित,

 राम पुत्रों में आज्ञाकारी।

माँगो पूत मनोवांछित वर,

एक नहीं   तीन  तीन वर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 20

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943------)







रहती  संकट  में  मातु साथ,

कहो राम क्या संकट आज।

क्यों नीर भरे नयनों में आज,

उठो पूत  क्या  संकट  आज।।


माँ कहने में  संकोच आज,

पितु आदेश कठिन आज।।

हर संकट में माता रहे साथ,

कहो पूत क्या संकट आज।।


पूत  के कष्ट  निवारण हेतु,

प्राणोंत्सर्ग  भी कम जानो।

क्या पूत  तुम्हारे पथ संकट?

तुरत निवारण उसका जानो।।


मातु आज कठिन परीक्षा भारी,

पितु आदेश कठिन  अरु भारी।

कहो पूत क्या आदेश  पति का,

पूत हमारा प्राणों  से अति भारी।।


प्राणेश्वर का हो आदेश यदि,

काट शीश ले जाओ  अभी।

माता रक्षक सदा हि पूत की,

कहो पूत  पितु आदेश अभी।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 26

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943---) कुटिया की दुर्गति देखि, अरु मातु पिता अपमान। मातु सम  दिव्य कामधेनु, ...