लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र (1943---) |
ध्यानस्थ थे राम महेंद्र गिरि,
जान मातु पिता संकट में।
पवन गति से जा पहुँचे शीघ्र,
अरु दुर्गति देखि कुटिया में।।
देखि पिता की निर्मम हत्या,
अरु माता का करुण विलाप।
पूँछ रहे राम बार बार जननी से,
किसने की हत्या अरु महा पाप?
आये सहस्त्रार्जुन पूत सेना सहित,
पितु तुम्हारे थे संध्या वंदन में लीन।
आते ही उन्होंने काटा पितु शीश,
थे नाथ मुख बोले एक शब्द नहीं।।
पुत्र कामधेनु भी बलात ले चले,
पर कामधेनु चली गईं इंद्रलोक।
देखि अर्जुन पूतों के अत्याचार,
सहस्त्रार्जुन वंश मिटाऊँ एक बार।।
जमदग्नि निर्मम हत्या सुनि,
सभी देव हो गये थे हतप्रभ।
यति ऋषि मुनि अरु देवर्षि,
हुये अचंभित आज सभी।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©