लेखक एवं रचनाकार - अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| (अशर्फी लाल मिश्र 1943-----) |
दिनकर ने आँखें खोली,
तब कलियाँ थीं अलसाई।
पात पात पर बिखरे मोती,
रहा बटोर दिनकर मोती।।
अब खुल रही थी आँखें,
एक एक कलियन की।
मधुकर कर रहे थे गुंजन ,
मनु घेरे थे रसिक जन।।
कुछ मकरंद में मदहोश,
कुछ कर रहे थे गुंजन।
कुछ आ रहे थे अभी,
चाहत सुगंध मकरन्द की।।
तितलियाँ थीं मन मोहक,
थीं निज सतरंगी वसन में।
दौड़ दौड़ कर रहीं नर्तन,
मनु मोह रहीं बागन में।।
इसी बीच आ धमका माली,
लिये डलिया निज हाथ में।।
जो खिलखिला रहीं कलियाँ,
चुन चुन रख लिये डलिया में।।
लेखक एवं रचनाकार: अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©