शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - -62

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







भगवन भार्गव राम  आश्रम में,

प्रवीण  द्रोण  दिव्यास्त्र ज्ञान में।

अनुमति  पाइ गुरु परशुराम की,

वापस आये कुरुक्षेत्र गुरुकुल में।।


अनुरोध भीष्म  पितामह के,

कौरव पाण्डव सह कर्ण को।

अस्त्र  शस्त्र  दिव्यास्त्र  ज्ञान,

कर्ण को नहीं दिव्यास्त्र ज्ञान।।


निराश  कर्ण अब जा पहुँचा,

गिरि महेंद्र विप्र राम के पास।

वेश बनाये था सरल विप्र का,

जँह पाया  ज्ञान दिव्यास्त्र का।।


दिवस एक सोये भार्गव राम,

सिर रखा था कर्ण  जंघे पर।

नींद खुली जब परशुराम की,

कीड़ा काट रहा  था जंघे पर।।


देख  रक्त  प्रवाह   सहनशीलता,

कर्ण  नाहीं  है बालक  विप्र  का।

दिया शाप  तभी कपटी कर्ण को,

होये विस्मरित ज्ञान दिव्यास्त्र का।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 23 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 61

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---)







अनीर्णित युद्ध छोड़ देवव्रत से,

भार्गव वापस आये महेंद्र गिरि।

अपनी  सिगरी भौतिक दौलत,

बाँट महिदेवन्ह आये महेंद्र गिरि।।


आ गये तभी विप्र द्रोण वहाँ,

पर देने को धन था पास नहीं।

विप्र द्रोण  आप जब आये हैँ,

देने को दौलत अब पास नहीं।।


नहिं चाहूँ भौतिक धन भगवन,

हम  ज्ञान धन के भूँखे भगवन।

भौतिक धन का  हो सदा हरण,

ज्ञान धन  का नहिं  होय  हरण।।


भगवन  चाहूँ अस्त्र  शस्त्र ज्ञान,

युद्ध कला अरु दिव्य शस्त्र ज्ञान।

हो जाये  कृपा  यदि  विप्रवर की,

चरणों में सीखूँ  बैठ भगवन  की।।


भगवन भार्गव राम आशिष पाहि,

विप्र द्रोण ठहरे  भार्गव आश्रम में,

सभी अस्त्र शस्त्र  अरु दिव्य ज्ञान,

शीघ्र पा गये द्रोण गुरुवर भार्गव से।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर©

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 60

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







भार्गव राम का  हुआ आदेश,

देवव्रत अब युद्ध प्रारम्भ करो।

नहिं पहला प्रहार हो गुरुवर का,

देवव्रत पहुँच गये अपने रथ पर।।


दिव्य वाण छोड़ा भार्गव राम ने,

देवव्रत कंधे को छूकर निकला।

हाथ से मलकर निज  कंधे को,

छोड़ा देवव्रत तीर गुरु चरणों में।।



सूर्योदय के साथ होता युद्ध शुरू,

अरु बन्द होता युद्ध सूर्यास्त सदा।

पहला  तीर  सदा ही  चले गुरु का,

अभिवादन  तीर  चले  देवव्रत का।।


दिन इक्कीस  हुआ भीषण  युद्ध,

जय पराज्य का कोई निर्णय नहीं।

दोनों के  थे अस्त्र दिव्यास्त्र समान,

 पराजय  किसी को स्वीकार नहीं।।


ऋषि मुनि अरु देव थे बेचैन सभी,

पहुँचे कुरुक्षेत्र  पावन  भूमि  सभी।

संकेत पाय ऋषि मुनि अरु देवों का,

देवव्रत शीश था अब गुरु चरणों  में।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 59

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







देवव्रत  थे  बचन  बद्ध,

खुशी  पितु शांतनु हित।

न  करूंगा कभी विवाह,

अरु न धरूंगा सिर छत्र।।


मिला गुरु परशुराम सन्देश,

हो गये थे बेचैन अब देवव्रत।

थे भार्गव राम भी पहुंचे गये,

वायु मार्ग से पावन कुरुक्षेत्र।।


बचन बद्धता  के  कारण,

असंभव अंबा अपनाना। 

जग कलंक के भय से ही,

गुरु युद्ध  ही उचित माना।।


अब रथ  बैठ गये थे देवव्रत,

चल पड़ी  साथ उनकी सेना।

पहुँचे  पावन  भूमि  कुरुक्षेत्र,

सम्मुख देखा गुरु परशु  हाथ।।


रथ से उतर गये गंगा पुत्र,

चरण रज धरि गुरुवर की।

लीन्ह आशीष युद्ध भूमि में,

मन मुदित राम युद्ध भूमि में।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


भार्गव राम खण्डकाव्य - 58

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







था  रचा  स्वयंबर  काशी  में,

काशी  नरेश  की पुत्रियों का।

अपहरण कर लाये थे देवव्रत,

अंबा अंबिका अंबालिका का।।


अंबा ने हस्तिनापुर में बताया,

हमरे दिल में बैठे शाल्व नरेश।

जब जानी देवव्रत अंबा व्यथा,

ले गये अंबा पास शाल्व नरेश।।


अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,

अब थी निराश काशी नरेश बाला।

अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,

नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।


माँग रही न्याय भीख अंबा,

सारे जगत में भटकी  अंबा।

हर जगह ठुकराई  गईं अंबा,

आश्रम भार्गव अंत में अंबा।।


जब व्यथा सुनी अंबा की,

भेजा देवव्रत तुरत सन्देश।

अपनाओ अपहरित बाला,

या फिर करिये मुझसे युद्ध।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 57

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







गंगे! सब  अन्यायी क्षत्रिय राजा,

करें उत्पीड़न ऋषियों मुनियों का।

क्षत्रिय कैसे बना लूँ अपना शिष्य?

अरु कैसे दूँ  ज्ञान अस्त्र शस्त्र का?


भगवन! आप का  कथन सत्य,

क्षत्रिय राजा पथ अन्याय सदा।

पर हित उनमें नहिं  होता  भाव,

निज स्वारथ में  रहते  डूबे सदा।।


ऋषिवर!पूत हमारा अनुशासित,

सदा मातु पिता गुरु आज्ञाकारी।

गंगा  विनय  कर  रही  बार बार,

पूतहि  शिष्य बना  लो एक बार।।


गंगा पुत्र  चरण रज धरि,

अनुमति माँग रहे राम से।

अनुमति पाइ कहें देवव्रत,

नहिं छत्र, शपथ आज से।।


सब विधि आश्वासन पाइ,

स्वीकृति दी भार्गव राम ने।

शस्त्र ज्ञान अरु युद्ध कला,

दिया दिव्य ज्ञान भी राम ने।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

बुधवार, 2 सितंबर 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







इक्कीस  बार  कीन्ही  महि,

क्षत्रिय  विहीन राजाओं  से।

बाँट दी दौलत  उनकी सारी,

महिदेवन्ह को निज हाथों से।।


अन्यायी  क्षत्रिय  राजाओं  का,

था समूल नाश  का भाव अभी।

 पाय शिष्ट व्यवहार दशरथी राम,

दिया सारंग धनु राघव राम तभी।।


तप लीन हो गये  गिरि महेंद्र,

योंही बीत गये  हजारों साल।

धीरे धीरे युग त्रेता  बीत गया,

अब आ गया था द्वापर काल।।


आ गईं दिवस इक देवि  गंगा,

था साथ में उनका पुत्र देवव्रत।

कर रही प्रार्थना अब  गंगा थी,

भगवन! शिष्य बना लो देवव्रत।।


यह बालक यदुवंशी क्षत्रिय,

कैसे बना लूँ  अपना शिष्य?

भविष्य में बनेगा  यह राजा,

अन्यायी पथ पर होगा शिष्य।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - -62

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर अशर्फी लाल मिश्र (1943-----) भगवन भार्गव राम  आश्रम में, प्रवीण  द्रोण  दिव्यास्त्र ज्ञान में। अन...