लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र (1943----) |
गुरु वशिष्ठ की अनुमति से,
अरु मंत्री सुमंत की राय से।
सज गये थे रथ हाथी घोड़ा,
सज गई तभी पैदल सेना।।
थे बज रहे अब ढोल नगाड़े,
आगे आगे थे अश्व सैनिक।
सिर सोहे केसरिया पगड़ी,
थे हाथ लिये साकेत निशान।।
था पीछे दिव्य रथ वशिष्ठ का,
साथ में बैठे थे दशरथ राजा।
वशिष्ठ सिर था भव्य जटा जूट,
मुतियन जड़ित मुकुट राजा।।
अनुगामी रथ में शोभित,
राजा अरु थे राजकुमार।
विराजमान थे मध्य रथ,
भरत अरु शत्रुघ्न कुमार।।
पीछे पीछे जन साकेतपुरी,
थे दायें बायें गज असवार।
बज रहे नगाड़े ढोल पखावज,
तुरही झांझ शंख सिलसिलेवार।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।