लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र ( 1943---) |
सब विधि मातु अनुकूल जान,
कह दिया आदेश पिता का।
शीश काट ले जाओ पूत तुम,
अर्पित सहर्ष पति चरणों में।।
थी पितु आज्ञा सिरोधार्य,
धरि मातु चरण निज शीश।
मन में शिव को नमन कर,
काट दिया प्रिय मातु शीश।।
एक हाथ में था परशु,
दूजे मातु रेणुका शीश।
राम पहुँचे पितु के पास,
कीन्ह चरणअर्पित शीश।।
गदगद हो गये ब्रह्मर्षि अब ,
जान राम पितु आज्ञाकारी।
पर राम का चेहरा था उदास,
थीं जग खुशियाँ माता पास।।
जमदग्नि थे अति हर्षित,
राम पुत्रों में आज्ञाकारी।
माँगो पूत मनोवांछित वर,
एक नहीं तीन तीन वर।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©