मंगलवार, 28 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 41

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







शीश उगा  कण्व ऋषि बांस,

दो  धनु   निर्मित   विश्वकर्मा।

एक  धनु  का नाम  सारंग था,

दूजे  धनु  का  नाम   पिनाक।।


चतुरानन दे सारंग  विष्णु,

अरु पिनाक दिया महादेव।

वर्चस्व  हेतु अब द्वन्द युद्ध,

हुआ  विष्णु  अरु  महादेव।।


दोनों में कोई कम नहीं,

विष्णु अरु महादेव में।

ब्रह्माण्ड अब हाहाकार,

रोका ब्रह्मा  द्वन्द युद्ध।।


शिव ने  फेंका  पिनाक धरा,

उठा लिया धनु देवरात राजा।

थे देवरात राजा जनक पूर्वज,

था पिनाक अब  जनक राजा।।


विष्णु ने अब सारंग धनु को,

सौंप दिया था ऋषि ऋचीक।

अब शक्ति  संतुलन दोनों में,

विष्णु पालक शिव  संहारक।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।


सोमवार, 27 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 40

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







चतुरानन  मन  में आया  विचार,

कौन शक्तिशाली आज ब्रह्माण्ड।

देवराज इन्द्र  पास बुलाया  तभी,

सुदृढ़ दो  धनु  निर्मित होंय अभी।।


थी अनावृष्टि ब्रह्माण्ड,

था  वनस्पति  अभाव।

होय  सुदृढ़  बांस जब ,

हो सुदृढ़ धनु निर्माण।।


थे कण्व ऋषि तप में लीन,

दीमक से था  ढका शरीर।

सिर  ऊपर उगा एक बांस,

था सुदृढ़ लम्बा दिव्य बांस।।


थे देवराज  खड़े कर जोरे,

साथ थे ब्रह्मा विष्णु महेश।

त्रिदेव पुकार रहे थे बार बार,

कण्व आँखें खोलो एक बार।।


त्रिदेओं की ध्वनि जब गूंजी,

कण्व  ऋषि के कर्ण कुहर।

बाँबी दीमक हिल गई तभी,

गिर पड़ा  बांस भूमि  तभी।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


शनिवार, 25 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 39

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







समन्तपंचक ताल सभी,

आप्लावित लाल रक्त से।

राम कर रहे श्राद्ध तर्पण,

निज पितरों  का ताल से।।


दादा ऋचीक अरु पितर,

सभी प्रसन्न अब राम से।

आकाशवाणी  हुई तभी,

ऋचीक कहहिं  राम  से।।


बन्द करो अब राम तुम,

श्राद्ध तर्पण आज  से।

जाओ शीघ्र गिरि महेंद्र,

तप करो तुम  आज से।।


आकाशवाणी  जब सुनी,

निज  दादा  ऋचीक  की।

जा  पहुँच  गये   शीघ्र  ही,

देखि रम्य चोटी महेन्द्र की।।


रम्य शिला वहाँ  देखि राम,

रमे तभी उस  शिला  राम।

ध्यान  मग्न  हो गये थे राम,

थे बीत  गये  हजारों  साल।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 38

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







अत्याचारी अहंकारी क्षत्रियों का,

बध  कर  रहे  थे राम  बार  बार।

तप हेतु चले जाते गिरि महेंद्र पर,

पर क्षत्रिय अत्याचार हो बार बार।।


राजा जयध्वज के कुछ पौत्र,

बस  गये थे  समन्तपंचक में।

ऋषियों मुनियों  को ढूंढ़ ढूंढ़,

अपमानित कर  रहे पंचक में।।


ध्यानस्थ राम थे गिरि महेन्द्र,

ऋषि पुकार रहे थे राम राम।

उत्पीड़न पर  उत्पीड़न करते,

कहते  कहाँ हैँ अब  तेरे राम।।


कर्ण कुहर में ज्योंही गूँजी,

ऋषियों मुनियों  की पीड़ा।

पवन गति से चल पड़े राम,

जा पहुँचे समन्तपंचक राम।।


चलाया राम ने था परशु ऐसा,

बह चली रुधिर की धार वहाँ।

पाँच सरोवर थे अब तक सूखे,

थी रुधिर  प्रवाह से झीलें वहाँ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

विशेष : समन्तपंचक (कुरुक्षेत्र )


रविवार, 19 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 37

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







याहियावंशी  यदुवंशी के,

सौ थे राजा जयध्वज पूत.

कुछ राम भय  से  थे भागे,

पहुँचे  भोज, अवन्ति  पूत।।


जहाँ जहाँ थे अर्जुन  वंशी,

बढ़ रहे थे उनके अत्याचार।

ढूंढ़ ढूंढ़ ऋषियों मुनियों पर,

कर रहे थे राक्षसी व्यवहार।।


वृह्मर्षि राजर्षि सभी दुखी,

व्यवहार अर्जुन वंशज से।

तभी राम ने लिया संकल्प,

क्यों न मिटा दूँ शीघ्र धरा से।।


अब पवन वेगहिं चले राम,

शोभित जिनके परशु हाथ।

ढूंढ़  ढूंढ़  कर याहिया वंशी, 

सिर कटे पड़े थे धरा अनाथ।।


अर्जुन सहयोगी क्षत्रिय भी,

सिर विहीन थे भू पर आज।

क्षत्रिय अत्याचारी अहंकारी,

सभी भू  पर  पड़े  थे  आज ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


रविवार, 12 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 36

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







करुण क्रन्दन कर रही पद्मिनी,

पौत्र जयध्वज के मर जाने पर।

पूत पोते सभी छोड़ चले आज,

बलात ऋषि कामधेनु लाने पर।।


मातु  जयध्वज  की  मनोरमा,

थी बिलख बिलख कर रो रही।

देव पति की एक  महा भूल से,

आज महिषमती नगरी  रो रही।।


अब  चंद्रवंशी  याहियावंश में,

केवल अवलायें  हि अबलायें।

थीं  लाशों  पर  लाशें पटी हुई,

निज निज पूत खोजें अबलायें।।


महिष्मति  की अब गलियाँ,

शोणित  धारा से  थीं पूरित।

अरु धारा तैरें अब रुण्ड मुंड,

थी कठिन पहचान रुण्ड मुंड।।


ललनाओं को  राम ने छुआ नहीं,

अधिकार कर लिया था राज्य पर।

गर्भ में बालक पल रहे, उन्हें छोड़.

शेष  थे   रुधिर   डूबे  भूमि   पर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


बुधवार, 8 जुलाई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 35

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







राजा जयध्वज अर्जुन पूत,

सभी भ्रात अरु सेना साथ।

सम्मुख खड़े जमदग्नि पूत,

था परशु अस्त्र उनके हाथ।।


क्यों न जयध्वज वंश मिटाऊँ,

अरु सिगरी सेना आज अभी।

कहकर राम ने परशु चलाया,

काट दिया राजहि शीश तभी।।


दौड़  दौड़  कर जमदग्नि राम,

विद्युदभि परशु  काटहिं शीश।

खीरा सम कटे थे भूमि सैनिक,

ढेर थे लाशों के शीश पर शीश।।


सिगरी   नगरी  में  ढूंढ़  ढूंढ़,

हैहय वंशी क्षत्रिय किये बध।

राज वंश था अब नर विहीन,

किसी अबला को छुआ नहीं।।


दहशत फैल गईं सिगरी नगरी,

अबलायें अब  कर रही रुदन।

छाया  मातम अब राज महल,

रानियाँ  कर  रही सब क्रन्दन।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम खण्डकाव्य - 41

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र अकबरपुर कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943----) शीश उगा  कण्व ऋषि बांस, दो  धनु   निर्मित   विश्वकर्मा। एक  धनु  का ना...