लेखक एवं रचनाकार : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र ( 1943------) |
प्रात काल नित ही ऊषा,
सदा झाँकती वातायन से।
कभी नहीं चेहरा मुरझाया,
सदा विहँसते उसको पाया।।
इसी बीच दुष्ट कुहासा,
आ धमका वातायन पर।
मन में उसके थी ईर्ष्या,
पर्दा डाला वातायन पर
बचपन का मेरा याराना,
उसके संग हम खेले थे।
सदा विहँसती सुबह सुबह,
कहती छू लो सुबह सुबह।।
उसको देख हम दौड़ रहे,
वह थी पीछे हटती जाती।
इसी बीच भानु आ धमका,
भयभीत ऊषा छिप जाती।।
लेखक एवं रचनाकार: अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
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