राजा गाधि की थी पुत्री,
सत्यवती था उसका नाम।
माता ऋषि जमदग्नि की,
दादी रेणुका नंदन राम।।
राम जायें जब दादा पास,
आसन लगाकर बैठें पास।
दादा सुनाएँ दिव्य वेद मंत्र,
अल्प काल सब सीखे मंत्र।।
एक दिवस कुटिया आये,
जमदग्नि मामा विश्वामित्र।
ऋषि ऋचीक का संकेत पा,
दौड़ राम चरण रज लीन्ही।।
विश्वामित्र ने जब जाना,
पंचम पूत जमदग्नि का।
राजर्षि हो गये थे गदगद,
अरु गले लगाया राम को।।
दादी ने कहा तभी भ्रात से,
कुछ शस्त्र ज्ञान दीजे भ्राता।
सहर्ष विश्वामित्र ने कहा हाँ,
ले जाऊँ आश्रम राम अभी।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©