थे गये राम राजर्षि साथ,
मन में पाले एक ललक।
जल्दी मिले दिव्यास्त्र ज्ञान,
गायब नींद सदा अपलक।।
व्रह्म मुहूर्त की थी बेला,
खुली आँख राजर्षि तभी।
सम्मुख देखा खड़े राम,
सारंग धनु अरु तीर साथ।।
क्या नींद नहीं आई राम,
इस नये नये आश्रम में।
क्या किसी ने है विघ्न डाला,
सबक सिखाऊँ शीघ्र अभी।।
पितामह! मन में मेरे ललक,
दिव्यास्त्र ज्ञान तभी पलक।
दीजे मुझको दिव्यास्त्र ज्ञान,
तभी नींद अरु झपकें पलक।।
देखि ललक पौत्र राम की,
हर्षित राजर्षि अति मन में।
ऊषा की पहली किरण जान,
प्रारम्भ हुआ दिव्यास्त्र ज्ञान।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
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