ब्रह्म मुहूर्त में ऋषिवर जागें,
कंधे धनु सम्मुख राम दिखें।
दौड़ि राम चरण सिर नावहिं ,
नित ही गुरु आशिष पावहिं।।
राजर्षि देहिं दिव्यास्त्र ज्ञान,
ताहि सीखें राम चित्त लगाइ।
बालक राम ने अल्प समय में,
सीख लिये सब चित्त लगाइ।।
राजर्षि कहें अब राम से,
अभी शेष है युद्ध कला।
आह्वान ही दिव्यास्त्रों का,
अरु प्रयोग है युद्ध कला।।
युद्ध कला में हो प्रतिद्वंदी,
तभी होये ज्ञान युद्ध कला।
गुरुवर राम आज प्रतिद्वंदी,
दीजे ज्ञान अब युद्ध कला।।
असहज हो गये राजर्षि,
सारंग धनु की टंकार से।
ऋषिवर ने हाथ उठाकर,
पूर्ण शिक्षा राम आज से।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
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