लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र (1943---) |
गुरु कृपा से अब राघव राम,
उठा लिया धनु दोनों कर से।
खुशी फैल गईं सिगरी सभा,
करतल ध्वनि हो रही सभा।।
जनक लली इक टक देखै,
जब धनुष उठा दोनों कर से।
थीं सखियाँ पास जनक लली,
करें ठिठोली जनक लली से ।।
एक सखी कह रही सखी से,
जनक लली कर्पूर सी गौर।
राम दिख रहे कुछ काले काले,
दूजी सखी राम केश घुँघराले।।
सखियन बीच कह रही सखी,
चाँद सा मुखड़ा जनक लली।
जनक लली भी अब देख रही,
तिरछे नयनन अब राम बली।
अब प्रण पूरा होये पितु का,
शिव आराधै जनक लली।
अब राम पिनाक संधान करें,
अधीर हो रही थी जनक लली।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 06 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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बहुत बहुत हृदय से आभार।
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंजोशी जी! आपका हृदय से आभार।
हटाएंसिया राम के प्रथम मिलन का सुंदर वर्णन
जवाब देंहटाएंअनीता जी! आप का हृदय से आभार।
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