मंगलवार, 4 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 45

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943---)







गुरु कृपा से अब राघव राम,

उठा लिया धनु दोनों कर से।

 खुशी फैल गईं सिगरी सभा,

करतल ध्वनि हो  रही सभा।।


जनक  लली  इक  टक  देखै,

जब धनुष उठा  दोनों कर से।

थीं सखियाँ पास जनक लली,

करें  ठिठोली  जनक लली से ।।


एक सखी  कह रही सखी से,

जनक  लली  कर्पूर  सी  गौर।

राम दिख रहे कुछ काले काले,

दूजी सखी राम  केश  घुँघराले।।


सखियन बीच कह रही सखी,

चाँद सा मुखड़ा जनक लली।

जनक लली भी अब देख रही,

तिरछे नयनन  अब  राम बली।


अब प्रण पूरा होये पितु का,

शिव  आराधै  जनक  लली।

अब राम  पिनाक संधान करें,

अधीर हो रही थी जनक लली।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 06 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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भार्गव राम खण्डकाव्य - 45

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