गुरुवार, 27 अगस्त 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 55

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







भार्गव  राम ने सब  विधि जाना,

अन्याय  हुआ नहि सीय स्वयंबर।

पवित्र  संकल्प देख  राजा जनक,

जामद्गन्य संतुष्ट हुये सीय स्वयंबर।।


भार्गव राम के कंधे था धनु,

पास बुलाया दशरथी राम।

लो पितु से पाया सारंग धनु,

संधान करो तुम अभी राम।।


चरण रज धरि अरु आशिष पाइ,

दोनों कर लीन्हा धनु सारंग राम।

खींचा चाप ज्योंही ही तीर चढ़ाइ,

थे गद गद हो  गये जमदग्नि राम।।


सारंग धनु दादा ऋचीक विष्णु से,

दादा  ऋचीक दीन्हा पितु मेरे को।

मुझे धनु  मिला पितु जमदग्नि से,

अब पारतोशिक में राघव राम को।।


सारंग धनु सदा रहा न्याय साथ,

ऐसा सोच सौंप दिया राघव राम।

वापस  गिरि  हुये जमदग्नि राम।

पुनः तप  लीन  हुये  भार्गव राम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।©

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