लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र |
शर चाप चढ़ाया जब ही राम
करतल ध्वनि से गूँजी सभा।
राम खैचत चाप दो टूक भयो,
थी थिरक पड़ी सिगरी सखियाँ।।
थी रानी सुनयना भी थिरक पड़ी,
अब बिन थिरके राजा जनक नहीं।
थी छोटी बहन अब सीय उर्मिला,
फुदक फुदक कर नृत्य करने लगी।।
दोनों कर में था अब शोभित,
भव्य जयमाल जनक लली।
दायें बायें मांडवी श्रुतकीर्ति,
दोनों राजा कुशध्वज लली।।
कुशध्वज राजा जनक भ्राता,
कर उठाय अब थिरकन लगे।
आये थे राजा स्वयंबर बली,
सब करतल ध्वनि करने लगे।।
सीय अधरन बिच दंत दिखें,
मनु पंगति खिली कुंद कली।
कपोल भी अब कुछ कह रहे,
मनोदशा अब जनक लली।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
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