लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
| अशर्फी लाल मिश्र (1943---) |
करुण क्रन्दन कर रही पद्मिनी,
पौत्र जयध्वज के मर जाने पर।
पूत पोते सभी छोड़ चले आज,
बलात ऋषि कामधेनु लाने पर।।
मातु जयध्वज की मनोरमा,
थी बिलख बिलख कर रो रही।
देव पति की एक महा भूल से,
आज महिषमती नगरी रो रही।।
अब चंद्रवंशी याहियावंश में,
केवल अवलायें हि अबलायें।
थीं लाशों पर लाशें पटी हुई,
निज निज पूत खोजें अबलायें।।
महिष्मति की अब गलियाँ,
शोणित धारा से थीं पूरित।
अरु धारा तैरें अब रुण्ड मुंड,
थी कठिन पहचान रुण्ड मुंड।।
ललनाओं को राम ने छुआ नहीं,
अधिकार कर लिया था राज्य पर।
गर्भ में बालक पल रहे, उन्हें छोड़.
शेष थे रुधिर डूबे भूमि पर।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर मंगलवार 14 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
आभार आपका।
हटाएंबेहतरीन पंक्तियाँ
जवाब देंहटाएंआभार आपका।
हटाएंमार्मिक प्रसंग
जवाब देंहटाएंदेवि अनीता ! आपका आभार।
हटाएंसुंदर
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