गुरुवार, 18 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 25

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






तप हेतु  राम अभी  तक बाहर,

जब आये  वापस पितु कुटिया।

कुटिया  लगती अब  उजड़ी सी,

थी कामधेनु  अब नाही कुटिया।।


मातु  पास  जब  गये राम,

गले  लिपट कर रोने लगी।

कैसे  हुई   कुटिया  दुर्गति,

अब नाहि दिखती कामधेनु।।


बह रही थी  मातु असुवन धारा ,

मुख  निकलहि  इक  शब्द नहीं।

अब  कीन्ह  इशारा पितु की ओर,

पर मुख निकलहि इक  शब्द नहीं।।


सिर धरि राम  पितु चरणों  में,

तात! हुई  दुर्गति कुटिया कैसे?

थी कुटिया शोभा मेरी कामधेनु,

कहाँ गई  वह  मेरी  सुरभि धेनु?


आया महिष्मति नगरी  राजा,

सहस्त्रार्जुन सेना लेकर साथ।

अपमानित कर दुर्गति कुटिया,

दिव्य  कामधेनु  ले गया साथ।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

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भार्गव राम खण्डकाव्य - 25

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