कार्तवीर्य था अति बलशाली,
भगवन दत्तात्रेय के वरदान से।
हो गईं थीं दो से भुजायें हजार,
भगवन दत्तात्रेय के वरदान से।।
एक दिवस आ धमका अर्जुन,
ऋषि जमदग्नि की कुटिया पर।
था महिष्मति का अधिपति वह,
साथ उसके सेना थी कुटिया पर।।
जमदग्नि ने जब जाना,
राजा आये मेरी कुटिया।
अब राजा के स्वागत में,
खोल दी अपनी कुटिया।।
थी दिव्य चमत्कारी कामधेनु,
भव्य स्वागत कीन्ह जमदग्नि।
सेना सहित निज स्वागत देख,
था अचंभित अब सहस्त्रार्जुन।।
बलशाली घमंडी सहस्त्रार्जुन,
बल पूर्वक ले गया कामधेनु।
अपमानित कर ऋषि जमदग्नि,
बलात ले गया दिव्य कामधेनु।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
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