मंगलवार, 9 जून 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 22

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----)







बार बार कहहिं  ऋषि जमदग्नि,

पूत माँग लो मनोवांछित वरदान।

भ्राता मेरे थे सदा संकट में रक्षक,

आज बिनु भ्राता जग  सूना जान।।


पूत  तुम्हारा अति  सुन्दर वरदान,

तुम्हारा भाव निज भ्राता कल्यान।

तभी  अचानक   दिख  गये भ्राता,

जमदग्नि ने  दिया पहला  वरदान।।


मन में राम अब क्या है इच्छा,

अब शीघ्र मांगो दूजा वरदान।

मातु बिना जग  सूना  लागहि,

अब कौन बुलाये मुझको लाल।।


तभी अचानक रेणुका जागी,

बार बार पुकार रही बेटा राम।

माता अरु सब भईया सम्मुख,

तब भी दिखे अति उदास राम।।


तीजा वरदान अब माँगहि राम,

विस्मृति हो जाये अप्रिय घटना।

था ऋषिवर हाथ सिर बेटा राम,

अब प्रफुल्लित थे जमदग्नि राम।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 13 जून 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
  2. पौराणिक कथा का सुंदर काव्य रूपातंरण

    जवाब देंहटाएं

भार्गव राम खण्डकाव्य - 22

  लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र ( 1943----) बार बार कहहिं  ऋषि जमदग्नि, पूत माँग लो मनोवांछित वरदान। भ्राता मेर...