शुक्रवार, 27 मई 2022

नीति के दोहे मुक्तक

 --अशर्फी लाल मिश्र

अशर्फी लाल मिश्र 









प्रकृति 

हो धीरज  वाणी उचित, या  उदारता   ज्ञान।

इनको मानो सहज गुण, नहि उपदेशन भान।।

शिष्टाचार

लघुता में गुरूता छिपी, गुरूता को लघु जान।

पहले   बोले    भेंट   में, उसमें   गुरूता   मान।।

दुर्जन

दुर्जन  को  शिक्षा दिये, कबहुँ न सज्जन कोय।

जिमि जड़ सींचे दूध से, नीम  न   मीठी   होय।।

--अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

12 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छे दोहे हैं, मान्यवर वाह!

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२८-०५-२०२२ ) को
    'सुलगी है प्रीत की अँगीठी'(चर्चा अंक-४४४४)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. उत्तर
    1. अनीता जी!
      यह साधारण मानवीय त्रुटि है इसमें माफी का कोई प्रश्न ही नहीं उठता. आप हमारी छोटी बहिन सदृश्य हैँ. आप ने माफी शब्द लिखकर हमारा सम्मान बढ़ाया है अतः बहुत बहुत शुक्रिया.

      हटाएं

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