सोमवार, 11 मई 2026

भार्गव राम (खण्डकाव्य) -7

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर, कानपुर।©


अशर्फी लाल मिश्र (1943----)






खेल खेल में राम सीखे,

धनु संधान जमदग्नि से।

खुशी खुशी में धनु पाया,

अपने पितु जमदग्नि से।।


धनु का नाम था सारंग,

ऋचीक से जमदग्नि को।

वही धनुष खुशी खुशी में,

जमदग्नि  दीन्हा राम को।।


बचपन से  धनुहाँ प्यारा,

धनु सारंग रहता साथ में।

जहाँ  कहीं भी जाते राम, 

धनु सारंग रहता साथ में।।


राम  गये राजर्षि संग,

सारंग  कंधे राम संग।

पवन वेग से थे महर्षि,

उसी चाल थे राम संग।।


महर्षि  थे चकित मुदित,

बालक राम की चाल से।

मन में  थे आल्हादित थे,

अरु चेहरे की मुस्कान से।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शुक्रवार, 8 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 6

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-------)






आशीष मातु प्रात काल,

अरु पितु  अनुमति पाइ।

दादी चरण रज सिर धरि,

अरु दादहिं शीश झुकाइ।।


चल पड़े  राम हर्षित हुइ,

राजर्षि  विश्वामित्र साथ।

आगे आगे चलें  ऋषिवर,

अनुगामी राम साथ साथ।।


महर्षि आश्रम था बिसौल

 जिला मधुबनी बिहार में।

दूर की यात्रा  जान ऋषि,

चल रहे पवन की चाल में।।


 आश्रम निकट जनकपुर,

मिथिला  के साम्राज्य से।

सौ योजन की दूरी पर था,

जमदग्नि  के आवास  से।।


बीच बीच में मुड़कर देखें,

ऋषिवर जमद्गनि राम को।

कुछ पल में  निज आश्रम,

लिये भगिनी पौत्र राम को।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।©


बुधवार, 6 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 5

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर.

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)







सहमति जानि भ्राता की,

राम की दादी हुईं गदगद।

धाये राम मातु की कुटिया,

जहाँ पिता बैठे  जमदग्नि।।


अति हर्षित होकर राम कहहिं,

ऋषि विश्वामित्र हैँ दादी पास।

जब नाम सुना निज मामा का,

मिलने दौड़े हर्षित माता पास।।


दूर से देखि ऋषि मामा को ,

दौड़ि प्रणाम करहिं जमदग्नि,

आगे  बढ़  विश्वामित्र राजर्षि,

 गले लगाया ऋषि जमदग्नि।।


बहुत काल  में दर्शन दीन्हें ,

अब चलिये मेरी कुटिया में।

मन में  अति  हर्षित होकर,

राजर्षि जमदग्नि कुटिया में।।


कुटिया  जब  पधारे  राजर्षि,

रेणुका, राम चरण रज लीन्ह।

जोरि  पाणि  विनती  रेणुका,

अब राम तुम्हारी शरण कीन्ह।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

शनिवार, 2 मई 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 4

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943-----)











राजा  गाधि की थी  पुत्री,
सत्यवती था उसका नाम।
माता  ऋषि जमदग्नि की,
दादी  रेणुका  नंदन  राम।। 

राम जायें जब दादा  पास,
आसन लगाकर बैठें पास।
दादा सुनाएँ दिव्य  वेद मंत्र,
अल्प काल सब सीखे मंत्र।।

एक  दिवस कुटिया आये,
जमदग्नि मामा विश्वामित्र।
ऋषि ऋचीक का संकेत पा,
दौड़ राम चरण रज  लीन्ही।।

विश्वामित्र ने जब जाना,
पंचम पूत जमदग्नि का।
राजर्षि हो गये थे गदगद,
अरु गले लगाया राम को।।

दादी ने कहा तभी  भ्रात से,
कुछ शस्त्र ज्ञान दीजे भ्राता।
सहर्ष विश्वामित्र ने कहा हाँ,
ले  जाऊँ आश्रम राम अभी।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य - 3

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943------)







रमणीक शिखर विंध्याचल का,

था खुला खजाना  प्रकृति का।

जानापाव  नाम   से  है  चर्चित,

जँह आश्रम स्थल जमदग्नि का।।


अद्य  वहाँ महू जिला इंदौर,

सोहे  आश्रम  जमदग्नि का।

प्रकृति  जहाँ खुली थिरकती,

 अरु उदगम स्थल चम्बल का।।


 हो ऊषा होंठों पर मुस्कान,

सदा  मयूर करते  हों नर्तन।

जँह साथ खेलें मृग वनराज,

अरु राम खेलें छौना वनराज।


प्रमुख सप्त  ऋषियों में,

वेदज्ञ  ऋषि थे जमदग्नि।

बालक राम की प्रतिभा से,

अभिभूत  ऋषि जमदग्नि।।


राम ने पाया वैदिक ज्ञान,

अपने पितु जमदग्नि से।

युद्ध-कला    शस्त्र-ज्ञान,

जमदग्नि चाहें  शिव  से।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर.©


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य -2

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







 घुटुवन चलत गिरत परत,

राम आवत कुटिया बाहर।

जब ध्यान गया  माई   का,

दौड़  पड़ी   कुटिया  बाहर।।


बाहर खेल रहे रेणुका नंदन,

साथ था छौना वनराज का।

एक क्षण थी मातु अचंभित,

सचमुच  छौना वनराज का?


वनराज खेल  में गुर्राया,

फेंका सौ योजन राम ने।

अति  हर्षित मातु रेणुका,

जब वनराज फेंका राम ने ।।


इसी बीच आ गये थे दादा,

ऋषि ऋचीक  कुटिया पर।

कल से राम खेलेगा नित्य,

मेरे साथ  मेरी कुटिया पर।।


राम नित्य  सुबह  जायें,

खेलें  दादा  कुटिया पर।

खेल खेल बहु शिक्षा पाई,

निज दादा की कुटिया पर।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©


शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

भार्गव राम खण्डकाव्य -1

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

अशर्फी लाल मिश्र (1943----)







वैशाख मास का रम्य महीना,

था सतयुग त्रेता सन्धिकाल।

तिथि तृतीया शुक्ल पक्ष की,

रेणुका जन्मा अद्भुत लाल।।


जमदग्नि कुटिया हो गई जगमग,

जब कुटिया में प्रगटा पंचम लाल.

हर्षित  होकर  गदगद  ऋषि ने,

नाम  रख  दिया  उसका 'राम'।।


जब जाना ऋषियों मुनियों ने,

भीड़ जुटी  ऋषि आश्रम पर।

सब दर्शन  को थे  लालायित,

प्रथम  दर्शन हों शिशु राम के।।


देव  भी गये   वेश  बदलकर,

दर्शन हित जमदग्नि राम के।

मुख तेज देख सभी अचंभित,

जिसने भी दर्शन किये राम के।। 

 

बालक राम का तेज देखि,

जमदग्नि थे अब  चिंतित।

शस्त्र शास्त्र की शिक्षा कैसे,

गुरु  होंय स्वयं  शिव  जैसे।।

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©

भार्गव राम (खण्डकाव्य) -7

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र  , अकबरपुर, कानपुर।© अशर्फी लाल मिश्र (1943----) खेल खेल में राम सीखे, धनु संधान जमदग्नि से। खुशी खुशी में धनु पाया...