मंगलवार, 24 सितंबर 2019

नीति के दोहे मुक्तक

© अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर , कानपुर *

 मानवता 
धन बल जन बल होइ जब , हर  दुर्गुण छिप जाय।
ऐसे    बली    के    सम्मुख, मानवता      शरमाय।।

धन  की   होड़  चहुँ  ओर , नीति  अनीति  न  जान।
ऐसे    धन    संग्रह     से , कबहुँ   न   हो  कल्यान।।

लूट    मची    बाजार     में , जो    चाहे   सो    लूट।
घटिया   माल  बजार    में , मिले   छूट  पर   छूट।।




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