लेखक : अशर्फी लाल मिश्र
अशर्फी लाल मिश्र |
छोटा कद होय पति का ,पत्नी लम्बी होय।
कितनी सुंदर होय छवि ,जोड़ी फबै न सोय।।
पति से हो अधिक शिक्षा,धनी मायका होय।
छोटा कद होय पति का,जोड़ी फबै न सोय।।
© कवि : अशर्फी लाल मिश्र ,अकबरपुर ,कानपुर।
द्वारा : अशर्फी लाल मिश्र
ॐ
द्वारा : अशर्फी लाल मिश्र
अशर्फी लाल मिश्र |
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हरितालिका व्रत के अवसर पर |
शैलजा कीन्हा कठिन व्रत,
बहु काल बीता करते व्रत।
था भादौं मास रैन उजियारी,
तृतीया तिथि अनुपम न्यारी।।
सम्मुख खड़े थे भोले आज,
मांगो इच्छित वरदान आज।
आप के दर्शन मेरा सौभाग्य ,
दया नाथ की मेरा भाग्य।।
नाथ तुम्हारा कर मेरे सिर पर ,
मेरा सिर हो तुम्हारे चरणों में।
प्रिये शैलजा प्राणों से प्यारी ,
तुम साथ रहो वामांगी हमारी।।
©कवि : अशर्फी लाल मिश्र ,अकबरपुर ,कानपुर ।
ॐ
द्वारा : अशर्फी लाल मिश्र
अशर्फी लाल मिश्र |
करना चाहूँ समाज सेवा, जैसे करता सागर।
बदले में बिन कुछ चाहे ,जैसे तत्पर सागर।।
सागर रत्नों की खान, नहीं कोई अभिमान।
धरती झुलस रही हो ,तरनि उगले आग।।
तब पवन संदेशा देय, समाज सेवी सागर।
सागर वेश बदलकर , साथ पवन जाकर।।
श्याम रूप धर , घनघोर वारिश कर।
तपन धरती की, शांत करता सागर।।
पुलकित धरिणी कहती, धन्य धन्य सागर।
तुझ सा नहिं समाजसेवी,धन्य धन्य सागर।।
©कवि : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र (1943----) बगिया में इक फूल गुलाब, देख माली कर रहा आदाब। भौरे करते उसका यशगा...